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अयोध्या में खास दीवाली, धर्म या वोट - democracia
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अयोध्या में खास दीवाली, धर्म या वोट

हिसाम सिद्दीक़ी

उत्तर प्रदेश के वजीर-ए-आला योगी आदित्यनाथ ने इस बार छोटी दीवाली के दिन 18 अक्टूबर को लंका फतेह के बाद भगवान राम की अयोध्या वापसी के जश्न को जोश व खरोश के साथ मनाकर एक बार फिर भगवान राम के नाम पर ही हिन्दुओं के वोट बीजेपी के लिए पक्के करने की कोशिश की। दरिया सरजू के किनारे और अयोध्या के दूसरे कई मकामात पर दिलकश चरागां किया गया।

यह चरागां करने के लिए तकरीबन दो लाख दिये रौशन किए गए। हजारों साल पहले जब भगवान राम वापस अयोध्या आए थे उस वक्त अयोध्या के लोगों ने उनके इस्तकबाल में घी के दिये रौशन किए थे। वजीर-ए-आला योगी आदित्यनाथ ने राम की वापसी का जो जश्न मनाया, तरीख (इतिहास) में ऐसा कभी नहीं हुआ।

राम, सीता और लक्ष्मण बने अदाकार हेमंत कालरा आंचल घई और विक्रांत को उत्तर प्रदेश सरकार के हेलीकाप्टर के जरिए अयोध्या में उतारा गया तो गवर्नर राम नाईक, वज़ीर-ए-आला आदित्यनाथ योगी, उनकी वजारत के बेश्तर (अधिकांश) वजीर और बडे पैमाने पर सरकारी अमला मौजूद था। वजीर-ए-आला आदित्यनाथ योगी ने तीनों को हार पहना कर उनका इस्तकबाल किया। इस दौरान दूसरा सरकारी हेलीकॉप्टर ऊपर से फूल बरसाता रहा।

गुजिश्ता 29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट केे चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस प्रफुल्ल गोरडिया की बेंच ने फैसला दिया था कि कोई भी मजहबी काम या जलसा टैक्स पेयर्स, अवामी और सरकारी पैसे से नहीं किया जा सकता।

अदालत के सामने मुकदमा यह था कि 2002 में गुजरात में दंगाइयों ने जिन मस्जिदों और इबादतगाहों को नुक्सान पहुंचाया था उनकी मरम्मत का काम सरकार को कराना चाहिए या नहीं, गुजरात हाई कोर्ट का फैसला था कि सरकार मरम्मत का काम कराए उस फैसले के खिलाफ सरकार सुप्रीम कोेर्ट गई थी। तो सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला उलट दिया था।

अब सवाल यह है कि अगर सरकारी पैसे से दंगो के दौरान तोड़ी गई इबादतगाहों की मरम्मत नहीं हो सकती तो उत्तर प्रदेश सरकार करोड़ों रूपए खर्च करके अयोध्या में  मजहबी प्रोग्राम कैसे कर सकती है। वह भी तब जबकि इस किस्म के प्रोग्राम का कोई रिवाज नहीं रहा है।

अगर भारतीय जनता पार्टी और भगवान राम के नाम पर सैकडों करोड़ का चंदा उगाहने वाली विश्व हिन्दू परिषद ने कभी ऐसा प्रोग्राम किया होता तब भी यह कहा जा सकता था कि अयोध्या में तो ऐसे प्रोग्रामों का रिवाज है। खुद आदित्यनाथ जिस गोरक्षा पीठ के महंत हैं उस पीठ के पास बेशुमार पैसा और दौलत है।

वज़ीर-ए-आला बनने से पहले योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या पर कभी सौ-दो सौ रूपए भी खर्च किए हों इसका कोई रिकार्ड नहीं मिलता। अब वजीर-ए-आला की हैसियत से उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार और सरकारी खजाने पर पूरा  अख्तियार (अधिकार) मिल गया तो उन्होनें अयोध्या की सजावट और दीवाली मनाने पर करोडों खर्च कर दिए।

उनका यह काम सुप्रीम कोर्ट के हुक्म की खिलाफवर्जी  करता या नहीं इसपर कोई फैसला या राय सुप्रीम कोर्ट ही जाहिर कर सकता है। बजाहिर तो वजीर-ए-आला आदित्यनाथ ने अपने वोट पक्के करने का काम कर ही लिया है। शायद इसे ही कहते हैं ‘माले मुफ्त- दिले बेरहम’। या अवध के गांव की जुबान में ‘हलवाई की दुकान, दादा का फातिहा’।

 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और उर्दू साप्ताहिक जदीद मरकज़ के संपादक हैं।)