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फेसबुक के खिलाफ दुनिया भर में उठी बहि’ष्कार की मांग

हाल में ही भारत सरकार ने चीन के एप्प्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को देश की अखं’डता, संप्र”भुता और राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर देश में प्रतिबंधित कर दिया है। ऐसा कोई उदाहरण अब तक नहीं सामने आया है, जिससे पता चलता हो कि ये एप्प्स और सोशल मीडिया प्लेटफोर्म्स किसी भी तरह से देश की अखं’डता, संप्रभु’ता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर धा’वा बोल रहे थे। दूसरी तरफ, जनता के बीच दिनभर फे’क न्यूज और जह’र उगल’ते फेसबुक और इन्स्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कोई कार्यवा’ही नहीं की जाती।

हाल में ही रंग’भेद के विरो’ध में चल रहे आन्दोलनों के बीच फेसबुक और इन्स्टाग्राम के बहिष्का’र और इसे विज्ञापन न देने की आवाज अमेरिका से उठी है और अब भारत छोड़कर पूरी दुनिया पर इसका असर देखा जा रहा है। इस मुहीम को अमेरिका के अनेक मानवाधिकार संगठनों ने सम्मिलित तौर पर शुरू किया है और इसे “स्टॉप हे’ट फॉर प्रॉफिट” का नाम दिया गया है। इसके अंतर्गत फेसबुक पर अपने विज्ञापन चलाने वाली कंपनियों से आग्रह किया गया है कि इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जुलाई के महीने में विज्ञापन ना दें और इसके बहि’ष्कार की भी मांग की गई है।

राजनीतिक विज्ञापनों पर रोक की तैयारी में फेसबुक

फेसबुक अपने पूरे नेटवर्क पर राजनीतिक विज्ञापनों पर रोक लगाने पर विचार कर रही है। यह प्रति’बंध अमेरिका में इस साल नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले लगाया जा सकता है। फेसबुक के अंदर इस मुद्दे पर चल रही चर्चा से जुड़े दो करीबी लोगों ने बताया कि अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। बता दें कि सियासी विज्ञापनों पर रोक लगाने के मसले पर चर्चा गत वर्ष के आखिर से ही चल रही है।

बडे पैमाने पर हो रहा है बहिष्कार
स्टॉप हेट फॉर प्रॉफिट के तहत जुलाई शुरू होने के बाद से अब तक लगभग 800 अमेरिकी कंपनियों ने फेसबुक को विज्ञापन देना बंद कर दिया है। इनमें फोर्ड, होंडा, लेविस स्ट्रास, टारगेट, युनिलिवर और एडीडास जैसी कंपनियां भी शामिल हैं। पेट्रोलियम कंपनी बीपी अभी इस संबंध में विचार कर रही है। यूरोप में वोक्सवैगन, हौंडा यूरोप, रोबिनसन, फोर्ड यूरोप, मार्स और ईडीएफ जैसी कंपनियों ने भी विज्ञापन देना बंद कर दिया है।

सेंटर कोउंटरिंग डिजिटल हेट के चीफ एग्जीक्यूटिव इनोरन अहमद ने यूरोपीय कंपनियों से इस मुहीम में शामिल होने का आह्वान किया है। उनके अनुसार फेसबुक को अमेरिका में राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है, पर यूरोप के अधिकतर देश तो इसे गं’भीर समस्या मानते हैं, इसलिए यूरोपीय कंपनियों की इस मुहीम में व्यापक भागीदारी होनी चाहिए।

यूनाइटेड किंगडम के 37 मानवाधिकार संगठनों ने ब्रिटिश कंपनियों से भी इस मुहीम में शामिल होने का आग्रह किया है। एक आकलन के अनुसार दुनिया भर के बड़े विज्ञापनदाताओं में से एक-तिहाई से अधिक स्टॉप हे’ट फॉर प्रॉफिट में शामिल हो सकते हैं। यूरोप में अनेक जनमत संग्रह में जनता ने फेसबुक को सभी गलत सूचनाएं, भ्रा’मक प्रचार, हिं’सा भड़’काने और फे’क न्यूज के लिए जिम्मेदार करार देने का समर्थन किया है।

न्यूजीलैंड के सबसे बड़े मीडिया हाउस- स्टफ ने भी घोषणा की है कि उन्होंने अस्थाई तौर पर फेसबुक से नाता तोड़ लिया है। हालांकि इसके फेसबुक पर दस लाख से अधिक फॉलोवर्स हैं, फिर भी स्टाफ ने फैसला लिया है कि इस प्लेटफॉर्म पर अगली सूचना तक कोई भी समाचार नहीं डाला जाएगा। कंपनी के अनुसार, “हम ऐसे किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को आर्थिक लाभ नहीं पहुंचाना चाहते, जो आर्थिक लाभ का उपयोग हे’ट स्पीच और हिं’सा भड़’काने में करता हो।”

न्यूजीलैंड के सबसे बड़े मीडिया हाउस- स्टफ ने भी घोषणा की है कि उन्होंने अस्थाई तौर पर फेसबुक से नाता तोड़ लिया है। हालांकि इसके फेसबुक पर दस लाख से अधिक फॉलोवर्स हैं, फिर भी स्टफ ने फैसला लिया है कि इस प्लेटफॉर्म पर अगली सूचना तक कोई भी समाचार नहीं डाला जाएगा। कंपनी के अनुसार, “हम ऐसे किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को आर्थिक लाभ नहीं पहुंचाना चाहते, जो आर्थिक लाभ का उपयोग हेट स्पीच और हिंसा भड़काने में करता हो।”

न्यूजीलैंड की मेसी यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की प्रोफेसर कैथरीन स्ट्रोंग ने इस कदम की सराहना की है। उनके अनुसार “फेसबुक और इन्स्टाग्राम अपने आर्थिक लाभ के चलते फे’क न्यूज, समाज में पनपने वाली घृ’णा और हिं’सा पर आखें बंद कर बैठे हैं। यह सब खत’रनाक है। इस वैश्विक महामारी के दौर में भी ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कोविड 19 से संबंधित भ्रा’मक और खत’रनाक समाचार फैलाने में व्यस्त हैं।”

न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्देर्न ने भी स्टाफ द्वारा उठाए गए कदम का स्वागत किया है, पर साथ ही यह भी कहा कि वे फिलहाल फेसबुक को नहीं छोड़ सकतीं, क्योंकि इसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से वो जनता से जुड़ी हैं। जेसिंडा अर्देर्न ने कहा कि वे फेसबुक से फे’क न्यूज पर नियंत्रण रखने का अनुरोध करेंगी। पिछले वर्ष क्राइस्टचर्च में मस्जि’दों पर एक ऑस्ट्रेलियन कट्ट’रपंथी ने स्वचालित हथि’यारों से गो’लीबा’री कर जब 50 से अधिक नमाज अदा कर रहे लोगों को मा’र डाला था, तब फेसबुक पर लाखों की तादात में भड़’काऊ और हिं’सक प्रवृत्ति के पोस्ट और वीडियो डाले गए थे, जिसकी न्यूजीलैंड ने स’ख्त शब्दों में भ’र्त्सना की थी।

फेसबुक अनेक वर्षों से अपने यूजर्स की व्यक्तिगत जानकारी भी लीक करता रहा है। साल 2018 के दौरान तो कैम्ब्रिज ऐनालीटिका मामले की खूब चर्चा की गई थी, जब करोड़ों लोगों की जानकारियां बाजार में पहुंच गई थीं। इसके बाद भी, फेसबुक के कार्य प्रणाली में कोई अंतर नहीं आया। साल 2019 में एक बार इन्स्टाग्राम ने 5 करोड़, और फेसबुक ने 42 करोड़ यूजर्स के डेटा लीक किए थे, यह मामला जब तक उजागर हुआ तब तक फेसबुक ने लगभग 27 करोड़ अन्य यूजर्स का डेटा बाजार में बेच दिया।

कैरोल कैडवलाद्र ने 5 जुलाई को द गार्डियन में फेसबुक के बारे में लिखा है, “दुनिया की कोई ताकत फेसबुक को किसी भी चीज के लिए जिम्मेदार बनाने में अस’मर्थ है। अमेरिकी कांग्रेस कुछ नहीं कर सकी और न ही यूरोपियन यूनियन इस पर लगाम लगा पाई। हालत यहां तक पहुंच गई है कि कैंब्रिज ऐनालीटिका मामले में जब अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन ने फेसबुक पर 5 अरब डॉलर का जु’र्माना लगाया तब फेसबुक के शेयरों के दाम आसमान छूने लगे।

नवजीवन से

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