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असम में बीजेपी का खतरनाक खेल

हिसाम सिद्दीकी 

नई दिल्ली: लोक सभा एलक्शन नजदीक आते देख भारतीय जनता पार्टी ने पूरे मुल्क में हिन्दू-मुस्लिम तनाव फैलाने के लिए असम में रह रहे कथित विदेशियों या घुसपैठियों का मसला सुप्रीम कोर्ट के एक आर्डर के बहाने छेड़ा है।

पहले मरहले में ही बीजेपी ने नफरत का यह जहर असम के अलावा मेघालय समेत नार्थ-ईस्ट के बाकी छः प्रदेशों, बंगाल और दिल्ली तक फैला दिया। दो अगस्त को बंगाल मे भी नेशनल रजिस्टर फार सिटीजनशिप (एनआरसी) लाने के नाम पर बीजेपी युवा मोर्चा ने कोलकाता में रैली निकाली।

इस दौरान युवा मोर्चा ने पूरी कोशिश की कि किसी तरह पुलिस के साथ उसका टकराव हो जाए। ग्यारह अगस्त को बीजेपी सदर अमित शाह ने कोलकाता मे रैली का एलान किया है।

होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह ने लोक सभा में यह मसला उठते ही कहा था कि जिन चालीस लाख लोगों को फिलहाल हिन्दुस्तानी शहरियों की फेहरिस्त में शामिल नहीं किया गया है उन्हें बीस अगस्त से दुबारा मौका दिया जाएगा कि वह मांगे गए जरूरी दस्तावेज पेश करके अपना नाम हिन्दुस्तानी शहरियों की फेहरिस्त में शामिल करा ले।

राजनाथ सिंह, मोदी के तमाम वजीर और बीजेपी व आरएसएस के सभी लीडरान बार-बार यह कह रहे हैं कि एनआरसी तैयार करने में सरकार का कोई हाथ नहीं है। यह कार्रवाई तो सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के मुताबिक हो रही है। इंतेहाई चालाकी के साथ भारतीय जनता पार्टी इस हकीकत पर पर्दा डाल रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ आर्डर किया था।

एनआरसी तैयार करने का काम तो बीजेपी की असम सरकार ही करा रही है। जिसने बडे़ पैमाने पर बेईमानी करके चालीस लाख लोगों को शहरियत के हक से महरूम रखा।

मौजूदा एनआरसी मे गैर मुल्की बताए जाने वाले चालीस लाख लोगों मे बीजेपी के दो मेम्बरान असम्बली, मुल्क के राष्ट्रपति रह चुके फखरूद्दीन अली अहमद के कुन्बे के लोगों, असम के चीफ सेक्रेटरी रहे एक आईएएस अफसर की बीवी, कई फौजियों और पुलिस अफसरान तक को गैर मुल्की करार दे दिया गया।

लेकिन बीजेपी मुल्क को यह तास्सुर (आभास) दिलाने की कोशिश कर रही है कि इनमें सभी मुसलमान हैं जिन्हें हर सूरत में निकालना है।

इतने अहम और हस्सास (संवेदनशील) मसले पर वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने अपने होट सिल लिए वह एक लफ्ज भी नहीं बोले लोकसभा में राजनाथ सिंह का बयान आने के बाद बीजेपी को ऐसा महसूस हुआ कि मुल्क में गैर मुल्की घुसपैठियों के बहाने जहर नहीं फैल रहा है तो नरेन्द्र मोदी ने बीजेपी सदर अमित शाह को इस काम पर लगा दिया।

अमित शाह ने तीन दिन तक राज्य सभा में इस मसले पर बोलने की कोशिश की तो अपोजीशन ने यह कहकर उन्हे बोलने नहीं दिया कि अमित शाह बेबुनियाद बातें करके लोगों को भडकाना चाह रहे हैं।

राज्य सभा में अपनी बात रखने मे नाकाम रहे गुस्से से तमतमाए अमित शाह ने फौरन प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और यह तक बोल गए कि जो चालीस लाख लोग हिन्दुस्तानी होने का सबूत नहीं पेश कर पाए हैं उन्हे तो हर हाल में भारत छोड़ कर जाना ही होगा।

सवाल यह है कि जब राजनाथ सिंह यह कह रहे हैं कि जिन लोगों के नाम हिन्दुस्तानी शहरियों के रजिस्टर में शामिल नहीं हो पाए है उन्हें एक मौका अगस्त में फिर दिया जाएगा ताकि वह अपनी शहरियत के सुबूत पेश कर सके तो अमित शाह किस हैसियत से यह बात कह रहे हैं कि चालीस लाख लोगों को तो देश छोड कर जाना ही होगा। जाहिर है वह मुल्क के कट्टरपंथी हिन्दुओं को घुसपैठियों के बहाने मुसलमानों के साथ टकराव की हालत में लाना चाहते हैं

ताकि लोक सभा एलक्शन में वह इसका फायदा उठा सके। असम में तेजी से उभरी आल इंडिया डिमाक्रेटिक यूनाइटेड फ्रण्ट (एआईडीयूएफ) के सदर लोक सभा मेम्बर बदरूद्दीन अजमल, कांग्रेस और ममता बनर्जी समेत तमाम अपोजीशन पार्टियों के लीडर बार-बार यह कह रहे हैं कि एनआरसी में शामिल न होने वाले लोगों में हिन्दू, मुस्लिम, बिहारी, असमी, उत्तरप्रदेश के लोग और देश के दीगर कई इलाकों से आए हुए लोग शामिल हैं।

इस मसले को हिन्दू-मुस्लिम मसला नहीं बनाया जाना चाहिए लेकिन बीजेपी सदर अमित शाह समेत पूरा आरएसएस कुन्बा यही साबित करने पर तुला है कि मसला बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों का है।

मोदी की मरकजी हुकूमत और असम की बीजेपी हुकूमत इस मामले पर किस हद तक बेईमानी कर रही है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य सभा में तृणमूल कांग्रेस के लीडर डेरेल-ओ-ब्रायन की कयादत में सूरतेहाल का जायजा लेने के लिए तृणमूल कांग्रेस के मेम्बरान पार्लियामेट दो अगस्त को असम के सिलचर पहुचे तो उन्हें शहर में दाखिल होने से रोक दिया गया।

डेरेक-ओ-ब्रायन ने कहा कि बीजेपी हुकूमतों का पागलपन ही है कि वह कानून बनाने वालों को कानून तोड़ने वाला समझ कर उनके साथ मुजरिमों जैसा बर्ताव कर रही है। यह तो सुपर इमरजेसी है। हम यही बैठेगे अगर शहर में न जाने दिया गया तो हम वापस भी नहीं जाएगे। उन्होने कहा कि हमारे ऐसे साथी एमपी से धक्का मुक्की की गई जो दिल के मरीज हैं और उन्हें पेस मेकर लगा है।

खबर लिखे जाने तक तृणमूल कांग्रेस के मेम्बरान पार्लियामेट सिलचर हवाई अड्डे पर ही बैठे थे। वोट के लालच में बीजेपी सदर अमित शाह को  बांग्लादेशी घुसपैठियों के बहाने मुल्क में नफरत का जहर फैलाना उस वक्त महंगा पड़ गया जब शिवसेना के बाद एनडीए के नाम पर बीजेपी के साथ रही अकेली पार्टी शिरोमणि अकाली दल भी असमियों के मामले पर बीजेपी के खिलाफ खडी हो गई।

सुखबीर सिंह बादल की मरकज में कैबिनेट वजीर बीबी हरसिमरत कौर बादल की कयादत में अकाली दल के सभी मेम्बरान पार्लियामेट ने दो अगस्त को होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह से मुलाकात करके साफ कह दिया कि इस मसले पर वह बीजेपी के साथ नहीं रह सकते। बाद में मीडिया नुमाइंदों से बात करते हुए हरसिमरत कौर ने कहा कि उनकी पार्टी किसी को भी घुसपैठिया करार देकर मुल्क से निकालने के हक में नहीं है।

उन्होने कहा कि जो लोग 30-35 साल से रह रहे हैं वह बांग्लादेश या कहीं से भी आए हुए हैं अब उन्हें हिन्दुस्तान की शहरियत मिलनी चाहिए। शिवसेना लीडर उद्धव ठाकरे पहले ही कह चुके हैं कि इस मसले पर ममता बनर्जी कोलकाता में जो महारैली करने वाली हैं उसमें शिरकत करने वह खुद भी जाएंगे।

बीजेपी के फैलाए जहर का असर असम और मेघालय की सरहद पर उस वक्त देखने को मिला जब सरकारी अफसरान से पूछे बगैर खासी स्टूडेंट यूनियन और बजरंग दल के लोगों ने एक गैर कानूनी चेक प्वाइंट बनाकर असम से मेघालय जाने वाली तमाम गाड़ियों और उसमें सवार लोगों को यह कहकर परेशान करना शुरू कर दिया कि वह लोग तो मेघालय में गैर मुल्की घुसपैठियों को घुसने से रोकने के लिए ऐसा कर रहे है।

सवाल यह है कि सरकार और पुलिस के रहते गुण्डे किस्म के लोगों को यह अख्तियार किसने दे दिया कि वह इस तरह बार्डर पर मुसाफिरों को रोक कर परेशान करे। मेघालय मे आजकल सैय्याहत (पर्यटन) का सीजन चल रहा है। इसलिए पूरे मुल्क से लोग वहां आते हैं। सड़क के रास्ते से आने वालों को असम होकर ही आना पड़ता है।

अमित शाह बीजेपी और नरेन्द्र मोदी की पूरी हुकूमत बार-बार सुप्रीम कोर्ट के आर्डर को बीच में घसीटकर मुल्क को गुमराह करने की कोशिश कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने तो एक गाइड लाइन जारी करते हुए यह देखने के लिए कहा था कि असम में हिन्दुस्तानी शहरियों का रजिस्टर तैयार किया जाए।

मौके पर किसी जज ने जाकर तो कुछ देखा नहीं वहां तो सारा काम बीजेपी सरकार के ही हाथों में है और बीजेपी सरकार की बेईमानी का आलम यह है कि उसने मुल्क के साबिक राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद मरहूम के भतीजे जैनुद्दीन अली अहमद का नाम ही गायब कर दिया। इस काम में बीजेपी इतनी बेईमानी करा रही है कि सैतालीस साल के एक सरकारी स्कूल टीचर मोईनउल हक के बच्चों समेत कुन्बे के ग्यारह लोगों को घुसपैठिया बता दिया गया है।

गुवाहाटी के रहने वाले बत्तीस साल से सीआईएसएफ की नौकरी कर रहे हेड कांस्टेबल उस्मान गनी के दोनों बच्चे तो हिन्दुस्तानी बताए गए लेकिन उस्मान गनी और उनकी बीवी को घुसपैठियों में शामिल कर दिया गया। इसी तरह बारपेटा के रहने वाले फौजी सिपाही इनाम उल हक के वाल्दैन, बीवी और चार बच्चों के नाम रजिस्टर में आ गए लेकिन खुद उनका नाम गायब है। असम पुलिस के असिस्टेट सब-इंस्पेक्टर पचास साल के शाह आलम भुइयां की बीवी और चार बच्चे तो हिन्दुस्तानी शहरी हैं लेकिन शाह आलम घुसपैठिए तो क्या दस से तीस साल पहले तक फौज पुलिस और सीआईएसएफ में जिन लोगों को भर्ती किया गया था वह बेंईमानी थी और भर्ती होने वालों की शहरियत की तस्दीक नहीं की गई थी।

गुवाहाटी में तैनात 48 साल के एक गजेटेड अफसर सादुल्लाह अहमद की बीवी हिन्दुस्तानी तो वह खुद और उनके दो बेटे घुसपैठिए हो गए। 29 साल के स्कूल टीचर मुसाबिर उल हक हिन्दुस्तानी हैं लेकिन उनका छोटा भाई घुसपैठिया। तीन साल से हिन्दुस्तानी शहरियों का रजिस्टर बनवाने में तैनात किए गए स्कूल टीचर मोईन उल हक की समझ में नही आ रहा है कि तमाम सुबूत  देने के बाद भी उनके भाई चार बहने और वाल्दैन के साथ खुद उन्हें और उनके बच्चों को घुसपैठियों में क्यों शामिल कर दिया गया।

एक सब-इंस्पेक्टर जो पिछले वजीर-ए-आला तरूण गोगोई की सिक्योरिटी मे थे उनकी ईमानदारी और फर्ज शनासी देखकर उन्हें मौजूदा वजीर-ए-आला सोनेवाल की सिक्योरिटी में भी शामिल किया गया। वह भी रिकार्ड के मुताबिक घुसपैठिया हो गया।

फूहड़पन की हद तक बेईमानी करके बीजेपी हुकूमत ने यह रजिस्टर तैयार किया है जब इसके लिए बारह सौ करोड़ रूपए खर्च किए गए। प्रदेश सरकार के पचपन हजार मुलाजमीन छः हजार आउट सोर्सिंग के जरिए बुलाए गए मुलाजमीन और नौ हजार लोग कांटै्रक्ट पर रखे गए तब ऐसा नतीजा देखने को मिल रहा है। इसमें सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है?

इस मसले पर लोक सभा में तो हंगामा रहा ही राज्य सभा की कार्रवाई कई दिनों तक नही चल पाई। बंगाल की वजीर-ए-आला ममता बनर्जी ने बीजेपी की साजिश पर सख्त एतराज जताते हुए कहा कि हम हिन्दुस्तानी अवाम के साथ हैं हम किसी भी कीमत पर मुल्क के लोगों को घुसपैठिया करार देकर उन्हें बाहर करने की साजिश को कामयाब नहीं होने देगे। अगर जरूरत पड़ी तो ऐसे लोगों को हम बंगाल में लाकर बसाएंगे।

उन्होने कहा कि बीजेपी जो खतरनाक खेल खेल रही है उसकी वजह से अगर वह रोका न गया तो मुल्क मे खून खराबे की नौबत आ जाएगी। राज्य सभा में लीडर आफ अपोजीशन गुलाम नबी आजाद ने बार-बार कहा कि सवाल हिन्दू-मुसलमान या किसी मजहब का नहीं है। सवाल यह है कि जो हिन्दुस्तानी शहरी हैं उन्हें घुसपैठिया कैसे करार दिया जा सकता है।

तमाम अपोजीशन पार्टियां एक तरफ लेकिन भारतीय जनता पार्टी और उसके तमाम लीडर बार-बार यही कन्फयूजन फैला रहे हैं कि सारा मामला बांग्लादेशी घुसपैठियों का है।

अभी असमियों का मसला हल भी नहीं हुआ था कि भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल और महाराष्ट्र में और मनोज तिवारी ने दिल्ली में हिन्दुस्तानी शहरियों का रजिस्टर बनाने का राग छेड़ दिया।

फौरन बीजेपी के कुछ लीडरों ने कहा कि उत्तर प्रदेश और बिहार में भी अब ऐसा ही रजिस्टर बनाना चाहिए। ऐसे में वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी को सामने आकर एलान कर देना चाहिए कि पूरे मुल्क में घुसपैठियों और हिन्दुस्तानी शहरियों के नाम तय करने के लिए एनआरसी बनाया जाएगा।

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