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दंगल गर्ल ज़ायरा वसीम ने एक्टिंग छोड़ने का किया एलान, बताया इस्लाम के खिलाफ़

आमिर खान की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘दंगल’ से डेब्यू कर रातोंरात मशहूर हुईं कश्मीरी एक्ट्रेस जायरा वसीम ने फिल्मी करियर को अलविदा कहने का फैसला किया है। उनका कहना है कि इसके कारण वह अपने धर्म से दूर जा रही थीं।

अपने फेसबुक पेज पर विस्तार से लिखे एक पोस्ट में 18 साल की एक्ट्रेस ने बॉलीवुड में अपने अच्छे करियर को छोड़ने के लिए मज़हबी वजहों का हवाला दिया।

ज़ायरा वसीम का फेसबुक पोस्ट

पाँच साल पहले मैंने एक फ़ैसला किया था, जिसने हमेशा के लिए मेरा जीवन बदल दिया था. मैंने बॉलीवुड में क़दम रखा और इससे मेरे लिए अपार लोकप्रियता के दरवाज़े खुले. मैं जनता के ध्यान का केंद्र बनने लगी. मुझे क़ामयाबी की मिसाल ती तरह पेश किया गया और अक्सर युवाओं के लिए रोल मॉडल बताया जाने लगा.

हालांकि मैं कभी ऐसा नहीं करना चाहती थी और न ही ऐसा बनना चाहती थी. ख़ासकर क़ामयाबी और नाकामी को लेकर मेरे विचार ऐसे नहीं थे और इस बारे में तो मैंने अभी सोचना-समझना शुरू ही किया था.

आज जब मैंने बॉलीवुड में पांच साल पूरे कर लिए हैं तब मैं ये बात स्वीकार करना चाहती हूं कि इस पहचान से यानी अपने काम को लेकर खुश नहीं हूं. लंबे समय से मैं ये महसूस कर रही हूं कि मैंने कुछ और बनने के लिए संघर्ष किया है.

मैंने अब उन चीज़ों को खोजना और समझना शुरू किया है जिन चीज़ों के लिए मैंने अपना समय, प्रयास और भावनाएं समर्पित की हैं. इस नए लाइफ़स्टाइल को समझा तो मुझे अहसास हुआ कि भले ही मैं यहां पूरी तरह से फिट बैठती हूं, लेकिन मैं यहां के लिए नहीं बनीं हूं.

इस क्षेत्र ने मुझे बहुत प्यार, सहयोग और तारीफ़ें दी हैं लेकिन ये मुझे गुमराही के रास्ते पर भी ले आया है. मैं ख़ामोशी से और अनजाने में अपने ईमान से बाहर निकल आई.

मैंने ऐसे माहौल में काम करना जारी रखा जिसने लगातार मेरे ईमान में दख़लअंदाज़ी की. मेरे धर्म के साथ मेरा रिश्ता ख़तरे में आ गया. मैं नज़रअंदाज़ करके आगे बढ़ती रही और अपने आप को आश्वस्त करती रही कि जो मैं कर रही हूं सही है और इसका मुझ पर फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है. मैंने अपने जीवन से सारी बरकतें खो दीं.

बरकत ऐसा शब्द है जिसके मायने सिर्फ़ ख़ुशी या आशीर्वाद तक ही सीमित नहीं है बल्कि ये स्थिरता के विचार पर भी केंद्रित है और मैं इसे लेकर संघर्ष करती रही हूं.

मैं लगातार संघर्ष कर रही थी कि मेरी आत्मा मेरे विचारों और स्वाभाविक समझ से मिलाप कर ले और मैं अपने ईमान की स्थिर तस्वीर बना लूं. लेकिन मैं इसमें बुरी तरह नाकाम रही. कोई एक बार नहीं बल्कि सैकड़ों बार.

अपने फ़ैसले को मज़बूत करने के लिए मैंने जितनी भी कोशिशें कीं, उनके बावजूद मैं वही बनी रही जो मैं हूं और हमेशा अपने आप से ये कहती रही कि जल्द ख़ुद को बदल लूंगी.

मैं लगातार टालती रही और अपनी आत्मा को इस विचार में फंसाकर छलती रही कि मैं जानती हूं कि जो मैं कर रही हूं वो सही नहीं नहीं लग रहा. लेकिन एक दिन जब सही समय आएगा तो मैं इस पर रोक लगा दूंगी. ऐसा करके मैं लगातार ख़ुद को कमज़ोर स्थिति में रखती, जहां मेरी शांति, मेरे ईमान और अल्लाह के साथ मेरे रिश्ते को नुक़सान पहुंचाने वाले माहौल का शिकार बनना आसान था.

मैं चीज़ों को देखती रही और अपनी धारणाओं को ऐसे बदलते रही जैसे मैं चाहती थी. बिना ये समझे कि मूल बात ये है कि उन्हें ऐसे ही देखा जाए जैसी कि वो हैं.

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