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कश्मीर पर संविधान मुखालिफ फैसला

हिसाम सिद्दीकी

नई दिल्ली: आरएसएस का पुराना एजेण्डा पूरा करने के लिए तीन सौ तीन (303) लोक सभा सीटों के गुरूर में चूर नरेन्द्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को स्पेशल दर्जा देने वाली संविधान की दफा तीन सौ सत्तर (370) और उसी के मुताल्लिक दफा 35ए हटाने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर का ‘स्टेटहुड’ छीन कर भले ही जारेहाना (आक्रामक) राष्ट्रवाद के समन्दर में अपने वोट बैंक को खूब गोते लगवा दिए हों लेकिन कश्मीर मसला इतनी आसानी से हल हो जाएगा इसपर किसी भी सही सोच के हिन्दुस्तानी को यकीन नहीं है। यह काम करने के लिए पूरे कश्मीर वादी को बंदूकों और रायफलों के साए में रखा गया है यह पहरेदारी कब तक जारी रखी जा सकेगी और क्या किसी भी प्रदेश को फौज और बंदूक दिखा कर काबू में रखा जा सकता है। यह बात शायद वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी और होम मिनिस्टर अमित शाह समझ नहीं सके हैं या समझ भी रहे हैं तो इस ख्याल से अपने मिशन में आगे बढते जा रहे हैं कि ठीक है और दस-बीस लोगों के मरने की भी नौबत आई तो कौन मरेगा? यह ‘कौन’ ही अपनी जान देकर मोदी और अमित शाह के वोट बैंक को और भी ज्यादा मजबूत करेंगे।

इस तरह फिलहाल तो सरकार के दोनों हाथों में लड्डू नजर आ रहे हैं आगे की आगे देखी जाएगी। कांस्टीट्एंट असम्बली के जरिए इसमें शामिल की गई दफा 370 को इस तरह हटाना संविधान के खिलाफ है। पेशे से सीनियर वकील कई लोक सभा मेम्बरान खुसूनन कांग्रेस के मनीष तिवारी ने यह बात बहस के दौरान राज्य सभा और लोक सभा में कही तो बिल पेश करने वाले होम मिनिस्टर अमित शाह ने यह कह कर उन सबकी दलीलों को हवा में उड़ा दिया कि आपको नहीं पता है हमने जो कुछ कहा है संविधान के ऐन मुताबिक है। इस बिल पर बहस में शरीक होते हुए फिर बहस का जवाब देते हुए अमित शाह ने पूरी तरह से डिक्टेटराना रवैया अख्तियार रखा। पार्लियामेंट में मेम्बरान और वजीर तक एक दूसरे का नाम लेते वक्त उनके नाम के साथ साहब या जी लगाकर ही मुखातिब करते हैं लेकिन अमित शाह ने राज्य सभा में एक नहीं कई बार यह रिवाज भी खत्म कर दिया। खुद से उम्र और सियासी तजुर्बे में काफी बडे़ लीडर आफ अपोजीशन को सिर्फ ‘गुलाम नबी’ कह कर मुखातिब किया। आपने गैर कानूनी तौर पर जम्मू-कश्मीर का रियासत का दर्जा खत्म करके यूनियन टेरिट्री बना दिया तो पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से का मुस्तकबिल क्या होगा। नेशनलिस्ट कांग्रेस की सुप्रिया सुले के इस सवाल पर लोक सभा में अमित शाह को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा कि जब मैं जम्मू-कश्मीर की बात करता हूं तो उसमें कश्मीर का वह हिस्सा भी शामिल रहता है जो पाकिस्तान के कब्जे में चला गया है। फिर उन्होने कहा कि पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर को वापस लेने के लिए हम जान दे देंगे। कई बीजेपी लीडरान ने बाद में कहा कि कश्मीर से दफा 370 हटाने के बाद मोदी और अमित शाह के निशाने पर अब पाकिस्तानी कब्जे वाला कश्मीर ही है। बहुत जल्द ही उसे भी भारत में शामिल करने का इरादा है।

मोदी सरकार का कश्मीर पर जल्दबाजी में लिया गया फैसला इसलिए भी गैर संवैधानिक है कि यह फैसला सदर-ए-जम्हूरिया (राष्ट्रपति) के जरिए जारी किए गए एक आर्डर से ही किया है। राष्ट्रपति का आर्डर जारी होने के बाद भी इसे पार्लियामेंट के दोनों एवानों में पेश किया गया। पांच अगस्त को राज्य सभा और छः अगस्त को लोक सभा से पास करा लिया गया। बिल को पढ कर बहस में शामिल होने का मौका भी पार्लियामेंट मेम्बरान को नहीं दिया गया। एवान में बिल पेश होने के साथ ही बहस शुरू हो गई। पहली अगस्त से ही कश्मीर की किलाबंदी शुरू कर दी गई थी। बडी तादाद में वादी में फौज और पैरा मिलिट्री फोर्सेज की तैनाती की गई लोगो से कहा गया कि वह कम से कम पन्द्रह दिनों तक के खाने के सामान, पीने के पानी और पेट्रोल वगैरह का स्टाक जमा कर लें। अमरनाथ यात्रा को पन्द्रह दिन पहले ही खत्म करा कर यात्रियों को वापसी के लिए मजबूर कर दिया गया। कश्मीर में मौजूद टूरिस्ट्स से फौरन ही वापस अपने घरों को जाने के लिए कह दिया गया। वादी में मजदूरी करने जाने वाले तकरीबन चार लाख मजदूरों को भी वापसी का फरमान सुना दिया गया। अमित शाह ने पार्लियामेंट के दोनों एवानों में बड़े गुरूर के साथ कहा कि आज से ही कश्मीर के बच्चां को तालीम का अख्तियार समेत वह सभी सहूलतें वहां के अवाम को मिलने लगेंगी जो दफा 370 की वजह से नहीं मिल पा रही थी। इसके अलावा देश-विदेश के सनअतकार कश्मीर में फैक्ट्रियां लगाएंगे तो बेरोजगारी भी खत्म हो जाएगी। वह यह भी भूल गए कि बारह अगस्त को मुसलमानों का दूसरा बड़ा त्यौहार ईद उल अजहा है जिसे बकरीद भी कहते हैं वह भी कश्मीर के लोग नहीं मना पाएंगे। मजहबी फरीजा पूरा करने के लिए कुर्बानी भी नहीं कर पाएंगे तो बाकी सब उन्हें कैसे हासिल हो जाएगा?

मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर जैसी रियासत को यूनियन टेरिट्री बनाकर कश्मीर और वहां के आम लोगों यानी बाशिंदों की शहरियत व स्टेटस की तौहीन कर दी है। कश्मीर की सरहदें दो ऐसे मुल्कों पाकिस्तान और चीन के साथ मिलती हैं जिनमें एक पाकिस्तान हमारा खुला दुश्मन है तो चीन चोरी छुपे दुश्मनों जैसी हरकतें करता रहता है। इतने हस्सास (संवेदनशील) प्रदेश को यूनियन टेरिट्री बना कर ज्वाइंट सेक्रेटरी सतह के एक अफसर के हवाले करना कहां की दानिशमंदी है। दरअस्ल इसके पीछे भी अमित शाह की एक चाल है वह यह कि यूनियन टेरिट्री रहेगी तो पूरी कश्मीर व जम्मू रियासत सीधे-सीधे होम मिनिस्ट्री यानी खुद अमित शाह के रहमो करम पर और उन्हीं के मातहत रहेगा। दिल्ली में बैठा ज्वाइंट सेक्रेटरी, श्रीनगर और जम्मू में बैठा लेफ्टिनेट गवर्नर और अगर कोई चीफ मिनिस्टर भी बन गया तो वह भी सीधे होम मिनिस्टर की ही मातहती में रहेगा। पूरी रियासत होगी तो वह वजीर-ए-आजम और राष्ट्रपति के मातहत रहती।

राज्य सभा और लोक सभा दोनों ही एवानों में बहस के दौरान और बाद में जवाब देते वक्त अमित शाह ने दफा तीन सौ सत्तर (370) हटाए जाने के नफा-नुक्सान की बात जितनी की उससे कई गुना ज्यादा वक्त मुल्क के पहले वजीर-ए-आजम, मुल्क के मेमार (निर्माता) ‘पंडित जवाहर लाल नेहरू’ को कश्मीर मामले में सबसे बड़ा विलेन साबित करने में लगाया। कई मेम्बरान ने कह दिया कि सरदार पटेल इस बात के लिए भी तैयार हो गए थे कि जूनागढ और हैदराबाद के बदले अगर पाकिस्तान कश्मीर लेना चाहे तो दिया जा सकता है। अपने जवाब के दौरान अमित शाह ने इस हकीकी तारीख (सच्चे इतिहास) को भी झुटलाने के लिए स्पीकर और चेयरमैन से कह कर सरदार पटेल की यह बात कार्रवाई से निकलवा दी। अमित शाह ने तकरीबन हर जुमले में पंडित जवाहर लाल नेहरू समेत कश्मीर के तीनों खानदानों शेख अब्दुल्लाह, महाराजा और मुफ्ती सईद कुन्बे को हर खराबी के लिए गुनाहगार करार दिया। इस तरह अमित शाह ने खुद को तारीखदां (इतिहासकार) साबित करने की भी कोशिशें बार-बार कीं।
दुनिया जानती है कि अगर शेख अब्दुल्लाह न होते तो आज कश्मीर का एक इंच हिस्सा भी भारत के साथ न होता। महाराजा हरिसिंह ने तो आजादी मिलने से पहले स्वीटजरलैण्ड के हाथों कश्मीर फरोख्त करने और आजादी के बाद पाकिस्तान के साथ जाने का फैसला कर लिया था। वह शेख मोहम्मब अब्दुल्लाह ही थे जिनकी और नेहरू की कोशिशों से दो-तिहाई से ज्यादा कश्मीर भारत के साथ रहा और तकरीबन एक-तिहाई ही पाकिस्तान के कब्जे में जा सका।

अमित शाह जैसे लोग अब होम मिनिस्टर बन गए तो जैसे खुदा हो गए। वह उन शेख अब्दुल्लाह पर कीचड़ उछालने का काम कर रहे हैं जिसने मुल्क की तकसीम के दौरान अपनी पार्टी मुस्लिम कांफ्रेंस का नाम तब्दील करके नेशनल कांफ्रेंस रखा था। उसने अपनी पार्टी का झण्डा हरे रंग के बजाए लाल रंग का बनवाया था और पार्टी का निशान हल तय किया था। मुस्लिम लीग के लीडर मोहम्मद अली जिनाह श्रीनगर गए तो शेख अब्दुल्लाह ने न सिर्फ उनसे मिलने से इंकार कर दिया था बल्कि शहर से भागने को मजबूर कर दिया था। उन्हीं की कोशिशों से कश्मीर का इलहाक (विलय) भारत के साथ दफा 370 के जरिए ही हो सका था।

अमित शाह और मोदी सरकार कश्मीरी अवाम की हमदर्दी का दम भरती है दफा तीन सौ सत्तर हटाए जाने के दौरान अमित शाह ने बार-बार कहा कि वह और उनकी सरकार जो कुछ कर रहे हैं सब कश्मीरी अवाम के मफाद के लिए कर रहे हैं। कश्मीरी अवाम से उन्हें कितनी हमदर्दी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है चार लाख से ज्यादा मजदूरों, हजारों अमरनाथ यात्रियों और सैय्याहां (पर्यटकों)  को कश्मीर से निकालने के लिए तो उन्होने फौज, रेलवे, एयरफोर्स और एयर लाइनों सबको लगा दिया लेकिन दिल्ली समेत मुल्क के बाकी प्रदेशों में रह कर तालीम हासिल कर रहे लाखों कश्मीरी लडके-लडकियों के बारे में सरकार ने कोई बंदोबस्त नहीं किया। उनके लिए बडे शहरों में हेल्प लाइन तक नहीं कायम की गई। टेलीफोन बंद, मोबाइल बंद, सोशल मीडिया बंद, इंटरनेट बंद बाहर रहने वाले तलबा और तालिबात को यह कह कर रोते देखा गया कि उन्हें इतना तो पता चल जाए कि कश्मीर में रहने वाले उनके वाल्दैन, भाई बहने और परिवार के दूसरे लोग जिंदा भी हैं या मार दिए गए? कश्मीर एनआईटी के तलबा को तो सरकार ने वहां से निकलने में पूरी मदद की थी फिर बाहर रह कर तालीम हासिल करने वाले लाखों तलबा के साथ सौतेलापन सिर्फ इसलिए कि वह मुसलमान हैं।

होम मिनिस्टर अमित शाह ने लोक सभा में जम्मू-कश्मीर के साबिक चीफ मिनिस्टर डाक्टर फारूक अब्दुल्लाह के सिलसिले में झूट भी बोला। सुप्रिया सुले ने सवाल उठाया था कि लोक सभा का अहम इजलास चल रहा है लेकिन हमारे एक सीनियर मेम्बर डाक्टर फारूक अब्दुल्लाह यहां मौजूद नहीं हैं। पता चला है कि श्रीनगर में उन्हें नजरबंद कर दिया गया है। वह अपने घर में हाउस अरेस्ट है। इस पर अमित शाह ने कहा कि न तो फारूक अब्दुल्लाह को हाउस अरेस्ट किया गया है और न ही उनके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है वह अपनी मर्जी से अपने घर पर हैं उनकी तबीयत भी बिल्कुल ठीक है। इस बयान के तकरीबन एक घंटे बाद एनडीटीवी पर फारूक अब्दुल्लाह को दिखाया गया। एनडीटीवी का नुमाइंदा बडी मुश्किल से उनतक पहुंच पाया था। उससे बात करते हुए फारूक अब्दुल्लाह ने साफ कहा कि उन्हें उनके घर में ही कैद किया गया है। उन्हें निकलने नहीं दिया जा रहा है उनके साथ मोदी सरकार ने पीठ में गोली मारने जैसा काम किया है। उन्होंने रोते हुए कहा कि उन्होने ऐसा हिन्दुस्तान कभी नहीं देखा था। इसीके साथ उन्होंने कहा कि वह सीने पर गोली खाने के वक्त तक अपने कश्मीरी अवाम के हुकूक के लिए लड़ने का काम करते रहेंगे।

इधर दिल्ली में पार्लियामेंट में दफा 370 खत्म करने की कार्रवाई चल रही थी तो उधर पूरी कश्मीर घाटी में सख्त कर्फ्यू के दौरान सिर्फ फौज पैरा मिलिट्री फोर्सेज के जवान और कटीले तारों की बाढें ही सड़कों पर दिख रही थी। इंसान तो दूर चिडियों तक को उड़ने की इजाजत नहीं थी। फौज के जरिए एक टूरिस्ट को वापस दिल्ली भेजा गया तो एयरपोर्ट पर उतरते ही उसने सोशल मीडिया पर लिख दिया कि कश्मीर में जितने दरख्त श्रीनगर जैसे शहर में हैं उनसे तीन गुना ज्यादा फौजी तैनात दिखे। इडियन एक्सप्रेस के नुमाइंदे और सीनियर सहाफी मुजम्मिल जलील छः अगस्त को श्रीनगर से दिल्ली आए तो आते ही उन्होंने लिखा कि श्रीनगर में 1846 से भी ज्यादा खराब हालात हैं पूरा शहर फौजी जवानों और कटीले तारों की शक्ल में नजर आ रहा है। मुजम्मिल जलील ने लिखा कि वह बड़ी मुश्किल से निकल कर आ सके हैं रेजिडेंसी रोड पर उनकी रिहाइश से हवाई अड्डे तक पहुंचने में उन्हे तीन घंटे लग गए। मोबाइल इंटरनेट और लैण्डलाइन्स सभी टेलीफोन बंद कर दिए गए है। पूरी वादी में सख्त कर्फ्यू है एटीएम खाली पडे हैं। उन्होंने लिखा कि उन्हे पता चला कि बारामुला में कुछ लोगों ने घरों से निकल कर मजाहिरा किया। एक खबर यह मिली कि मजाहिरा करने वाले दो लोगों की पुलिस की गोली से मौत हो गई। लेकिन हमारे पास ऐसा कोई जरिया नहीं था कि हम इन खबरों की तस्दीक कर सके। सड़कों पर तैनात जवानों को सख्ती से हिदायतें दी गई हैं कि सहाफियों और टीवी चैनल वालों को बैरिकेटिंग से आगे किसी भी कीमत पर जाने न दिया जाए।

दिल्ली में टीवी चैनलों के एयरकंडीशन्ड न्यूज रूमों और स्टूडियोज में बहस में शामिल मोदी भक्तों ने आम लोगों से ज्यादा खुशी का मजाहिरा किया। एंकर्स और एंकरनियां तो तकरीबन नाचते हुए कहती दिखी कि देश की तारीख मेंं पांच और छः अगस्त से बड़ा और तारीखी दिन कोई हो ही नहीं सकता। मोदी और अमित शाह ने जो कर दिया वह दुनिया का बडे से बडा हुक्मरां नहीं कर सकता। तकरीबन पागलों की तरह चीखने वाले रिटायर्ड जनरल बख्शी बार-बार कह रहे थे कि राज्य सभा में बिल पास होने के बावजूद पूरे कश्मीर में पूरी तरह अम्न व शांति का माहौल है। वह यह नहीं बता रहे थे कि चप्पे-चप्पे पर फौज और पैरामिलिट्री फोर्सेज के जवान तैनात हैं सख्त कर्फ्यू है ऐसे में अम्न व शांति नहीं होगी तो क्या लोग सडकों पर निकल कर डांस करेगे और गोली खाकर मरने का काम करेंगे। मोदी गुलाम तमाम चैनल भी कश्मीर वादी में 370 हटने से खुशी की लहर दौड़ने और अम्न व शांति होने के दावे करते रहे। मुजम्मिल जलील ने अपनी पोस्ट में इन चैनलों के झूट और बेशर्मी का भी पर्दा फाश किया है। उन्होने लिखा कि दिल्ली से श्रीनगर पहुचे टीवी चैनलां के लोग होटल के कमरों में ही बंद रहे बाहर निकलने की हिम्मत कोई नहीं कर पाया। लेकिन होटल से ही खबरें भेज रहे हैं कि कश्मीर वादी में तो पूरी तरह अम्न व शांति है। सडकों पर कोई हंगामा नहीं है कोई मजाहिरा और नारेबाजी नहीं हो रही है।

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