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बसपा के संस्थापक सदस्य का आरोप, मायावती ने नेता नहीं कलेक्शन एजेंट रखे हुए हैं

राज बहादुर यूपी के उन चुनिंदा दलित नेताओं में से एक हैं जो बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एंप्लाई फेडरेशन (बामसेफ), दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) और बसपा तीनों के अहम पदों पर रहे हैं. वो कहते हैं कि मायावती ने कांशीराम का सपना तोड़ा नहीं बल्कि ध्वस्त कर दिया है. कांशीराम बहुजन के लिए काम करते थे और मायावती सिर्फ अपने निजी हित के लिए काम करती हैं. निजी हित की वजह से न उन्होंने किसी पर विश्वास किया और न उन पर किसी और ने. इसलिए अब वो पार्टी में अपने परिवार के सदस्यों आनंद कुमार और आकाश आनंद को आगे बढ़ा रही हैं. मायावती ने नेता नहीं कलेक्शन एजेंट रखे हुए हैं.
‘जिसकी जितनी थैली भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’

बसपा के संस्थापक सदस्य राज बहादुर ने कहा कि, जब कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी तब इसका नारा था ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’, लेकिन जब से इसे मायावती ने टेकओवर किया है तब से इसका नारा हो गया है-‘जिसकी जितनी थैली भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’.

कांशीराम ने पहले बामसेफ, डीएस-4 और फिर बीएसपी बनाई
वो कहते हैं कि मायावती सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए काम करती हैं. उनका बहुजनों से कोई लेना देना नहीं है. जिस नेता को पैसे लेकर वो टिकट देती हैं वो जीतने के बाद सबसे पहले अपनी भरपाई करता है. वो बहुजनों के लिए काम क्यों करेगा? बसपा पहले मिशन थी लेकिन अब वो बिजनेस कर रही है. उन्हें न कांशीराम के दोस्त चाहिए थे और न बामसेफ के साथी.

बहुजन समाज पार्टी की स्थापना के बाद से 1994 तक यूपी में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे राज बहादुर का कहना है कि मायावती ने पार्टी में कभी पिछड़ों को नजदीक रखा, कभी मुस्लिमों और कभी ब्राह्मणों को. लेकिन उन्होंने भरोसा किसी पर नहीं किया. इन समाजों के नेताओं ने भी मायावती पर भरोसा नहीं किया. नतीजा यह हुआ कि जब पार्टी लड़खड़ाई तो ये नेता साथ छोड़ गए. उनके नजदीक रहने वाले जो लोग बसपा सरकार में मंत्री थे वही भाजपा सरकार में भी मंत्री हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि आपने अपने निजी स्वार्थ में कांशीराम के सभी साथियों को बाहर कर दिया. मिशन वालों की जगह आपने कलेक्शन एजेंट बना दिए. अब जब कोई विश्वासपात्र रहा ही नहीं तो मायावती अपने परिवार को आगे बढ़ाना ज्यादा सुरक्षित समझ रही हैं.

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