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कश्मीर से भागी क्यों भाजपा….

हिसाम सिद्दीकी

कश्मीर मामलात में मोदी और उनकी हुकूमत पूरी तरह नाकाम हो गई। बकौल गुलाम नबी आजाद जम कर पैसा कमाने और फौजी जवानों और अफसरान को दहशतगर्दों के हाथों मरवाने के बाद बीजेपी सरकार भाग खड़ी हुई। अब खबरें यह है कि वहां किसी सख्त रिटायर फौजी को भेज कर आम कश्मीरियों को बडे़ पैमाने पर ‘ठीक किया जाएगा’ यानि गोली बंदूक का राज चलेगा।  वहां एनएसजी तैनात भी कर दी गई है। खुद बीजेपी के कई लीडरान ने कहा कि महबूबा मुफ्ती की वजह से मुल्क दुश्मनों और पत्थरबाजों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की जा पा रही थी। अब रास्ता साफ हो गया है।

राम माधव ने बडी सफाई से कहा कि तीन साल में कश्मीर में कट्टरपन में बडे़ पैमाने पर इजाफा हुआ है। एनडीए पार्टनर्स के साथ दगाबाजी करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने महबूबा मुफ्ती के साथ जम्मू-कश्मीर हुकूमत मे साझेदारी करके पहले मुल्क, कश्मीर और फौजियों की हर तरह से तौहीन कराई फिर बड़ी चालाकी के साथ महबूबा सरकार से अपना हाथ खींच लिया। बीजेपी में इतनी भी अखलाकियात (नैतिकता) नहीं रही कि सरकार से अलग होने से पहले तीन साल तक साथ निभाने वाली महबूबा मुफ्ती को यह बताते कि अब हम सरकार नहीं चला सकते। महबूबा तो दूर बीजेपी ने अपने असम्बली स्पीकर, डिप्टी चीफ मिनिस्टर और दीगर वजीरों तक को यह भनक नहीं लगने दी कि वह महबूबा सरकार गिरा रही है।

19 जून को दोपहर में बीजेपी ने गवर्नर के जरिए महबूबा को उस वक्त इसकी इत्तेला दी जब पार्टी जनरल सेक्रेटरी राम माधव मीडिया नुमाइंदों को बुंलाकर यह एलान करने जा रहे थे कि बीजेपी जम्मू-कश्मीर सरकार से अलग हो रही है। जम्मू-कश्मीर सरकार में शामिल सभी वजीरों और स्पीकर को अमित शाह अपने आफिस मे लिए बैठे थे दूसरी तरफ राम माधव मीडिया से मुखातिब होकर सरकार से हटने का एलान कर रहे थे। बीजेपी ने कश्मीर के सिलसिले में मोदी सरकार की तमाम नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए नाकामियों का पूरा ठीकरा वजीर-ए-आला रही महबूबा मुफ्ती के सर फोड़ दिया। बीजेपी सदर अमित शाह चंद रोज पहले तक दावा कर रहे थे कि कश्मीर में दहशतगर्दी के वाक्यात में बहुत बडी कमी आई हैं।

सरकार गिराते वक्त राम माधव ने कहा कि महबूबा मुफ्ती की वजह से दहशतगर्दों पर काबू नहीं पाया जा सका और वादी में कट्टरपन में इजाफा हो गया तो इन दोनों में झूट कौन बोल रहा है?

कश्मीर जैसा हस्सास (संवेदनशील) मसला सरकार के हाथ से निकल गया तीन साल की लूट-खसोट के बाद अपनी नाकामियों का बोझ सर पर उठाए बीजेपी कश्मीर से भाग खडी हुई। इतने अहम वाक्ए पर भी वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के मुंह से एक लफ्ज नहीं निकला जबकि वह छोटी-छोटी बातों में भी लम्बी-लम्बी तकरीरें करते रहते हैं। कश्मीर में मोदी और महबूबा की मिली जुली सरकार के दौरान तीन सौ से ज्यादा बहादुर फौजियों की जान चली गई। जम्मू बार्डर के गांवों में रहने वाले सैकड़ों लोग मारे गए, हजारों लोगों को अपना गांव छोड़ कर दूसरी जगह मुंतकिल होना पड़ा, काश्तकारों की आमदनी का जरिया यानि बडी तादाद में मवेशी भी मारे गए।

वज़ीर-ए-आज़म नरेन्द्र मोदी, डिफेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण और होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह बार-बार घिसा पिटा बयान देते रहे कि हम फौजियों की कुर्बानी को जाया नहीं जाने देगे। दहशतगर्दों और दहशतगर्द भेजने वाले पाकिस्तान को मुंह तोड जवाब देंगे लेकिन जवाब देते हुए सरकार कभी दिखाई नहीं दी। दूसरी तरफ महबूबा सरकार में शामिल बीजेपी वजीर और मेम्बरान असम्बली तक ने जम कर लूट मचाई, सरकारी और फौजी जमीनों पर कब्जे किए। जम्मू-कश्मीर में किसी दौर में इतने बडे पैमाने पर बदउनवानी (भ्रष्टाचार) नहीं हुई। हद यह है कि मामूली रेवेन्यू अफसर से आईएएस अफसर तक के तबादलो में पैसा खाया गया।

पूरा मुल्क जानता है कि भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लोक सभा एलक्शन के पेशेनजर महबूबा मुफ्ती से अपना दामन बचाने का काम किया है क्योंकि इस सवाल पर हर तरफ पार्टी की थू-थू तो हो ही रही थी मोदी के हिन्दुत्ववादी हामी भी अवाम को जवाब नहीं दे पा रहे थे।

हुकूमत किसी भी तरह दहशतगर्दी पर काबू नहीं कर पा रही थी। तीन साल की महबूबा-बीजेपी सरकार में सबसे खतरनाक काम यह हुआ कि हजारों कश्मीरी नौजवानों ने पाकिस्तान के इशारे पर रायफलें थाम लीं मकामी तौर पर इतने दहशतगर्द पैदा हो चुके हैं कि अब पाकिस्तान को अपने यहां से भेजने की जरूरत ही नहीं है इन तीन सालों मे दूसरा खतरनाक काम यह हुआ है कि जम्मू और कश्मीर वादी दोनो ही इलाकों के लोगों के दरम्यान जो भाईचारा था वह नफरत में तब्दील हो गया।

जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी के पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से रिश्ता तोडने के बाद तमाम सियासी पार्टियां और सियासी तजजियानिगार यही कह रहे हैं कि यह एक बेमेल शादी थी और यह तो होना ही था मगर भारतीय जनता पार्टी ने सरकार में पार्टनर पीडीपी को बगैर कुछ बताए ही सरकार से अलग होने का फैसला किया वह न सिर्फ जम्हूरी कद्रों के मनाफी है बल्कि सीधे-सीधे गद्दारी के जुमरे में आता है और हर किसी को हैरान करने वाला है।

सबसे बडी बात यह है कि मार्च 2015 में जब हुकूमतसाजी के लिए यह गठजोड़ हुआ था तब यह कहा गया था कि यह गठजोड़ मुल्क के मफाद में है और जब रिश्ता तोडने का फैसला किया गया तो यही कहा जा रहा है कि बीजेपी के लिए एक्तेदार कोई मायनी नहीं रखता मुल्क का मफाद पहले है। ऐसा कह कर यह तास्सुर देने की कोशिश है कि मुल्क में सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही ऐसी सियासी पार्टी है जो मुल्क के मफाद में अपने को वक्फ किए हुए बाकी तमाम सियासी पार्टियां खुदगरज, मौका परस्त और एक्तेदार की लालची हैं।

भारतीय जनता पार्टी के सरकार से हिमायत लेने के फैसले का एलान करने के बाद जनरल सेक्रेटरी राम माधव ने जो वजूह बयान कीं वह सीधे-सीधे बीजेपी को कठघरे में खडी करने वाली हैं। उन्होने कहा कि मरकज ने हर तरह की मदद की लेकिन महबूबा मुफ्ती रियासत में हालात पर काबू पाने में नाकाम साबित हुई। पीडीपी से गठजोड का मकसद रियासत जम्मू कश्मीर की तरक्की करना था। लेकिन महबूबा मुफ्ती ने जम्मू और लद्दाख को नजरअदांज किया।

रमजान के दौरान फौजी आपरेशन रोका गया उम्मीद थी कि इसका मुसबत (सकारात्मक) असर होगा मगर न तो दहशतगर्दां पर असर पड़ा न तो हुर्रियत लीडरों पर। वारदातों में इजाफा हुआ। हम भले ही सरकार में थे लेकिन कयादत महबूबा मुफ्ती के हाथों में थी। पुलिस, इंतजामिया उनके मातहत थे। रियासत में हालात को संभालने में वह नाकाम रही। कश्मीर हिन्दुस्तान का अटूट हिस्सा है और सूबा के एत्तेहाद और सालमियत से किसी भी सूरत में समझौता नहीं किया जा सकता है।

कश्मीर के हालात पर काबू पाने के लिए हमने सरकार से अलग होने का फैसला किया। लेकिन उन्होने सरकार से नाता तोडने की जो वजूह बताई हैं उनमें एक भी वजह ऐसी नहीं है जो अचानक पैदा हुई हो। राम माधव ने जो वजहें तफसील से बताई वह तो हुकूमतसाजी के वक्त से बदस्तूर पाई जा रही थीं हां एक वजह का एहसास हाल ही में बीजेपी को हुआ था कि अगर 2019 तक यह गठजोड़ बरकरार रहा तो लोक सभा एलक्शन में शदीद दुश्वारियों का सामना करना पड़ सकता है। क्योकि पीडीपी के साथ रहते हुए अवाम का सामना आसान न होगा।

एक बीजेपी लीडर के मुताबिक जम्मू कश्मीर में जो सूरतेहाल पैदा हो गई थी और जिस तरह हमारे वोटर हम से नाराज होते जा रहे थे खुसूसन जम्मू और लद्दाख मे तो हमारे पास पीडीपी का साथ छोडने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा था। तजजियानिगार अब यह कह रहे हैं कि जम्मू कश्मीर हुकूमत में शामिल एक धडे ने खुद अपनी ही सरकार से गवर्नर राज की सिफारिश करके अपनी नाकामी को तस्लीम कर लिया है तो इसका जवाब सुब्रामण्यम स्वामी ने बेहतर तरीके से दिया है। उन्होने इसका एतराफ किया कि महबूबा मुफ्ती के साथ सरकार बनाना एक जुआ था मगर यह बाजी बीजेपी हार गई। उन्होने साफ लफ्जों में कहा कि डोगरा समाज हमारे खिलाफ हो गया है। हम अगर अब भी सरकार में शामिल रहते तो सारी सीटें हार जाते।

सुब्रमण्यम स्वामी ने अपने ट्वीट में यह भी कहा कि राम माधव ने बीजेपी-पीडीपी सरकार की नाकामी का एतराफ किया है। इसके लिए राम माधव और डोभाल के सिवा कौन जिम्मेदार है?

(लेखक उर्दू साप्ताहिक जदीद मरकज़ के संपादक हैं।)