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नामवर के होने न होने के बीच

मैनेजर पाण्डेय

भारतीय भाषाओँ में हिंदी आलोचना प्रभावशाली और विद्वतापूर्ण नामवर सिंह की वजह से है. आलोचना को अपने समय के साहित्य-सिद्धांत, विचारधारा और अद्यतन सामजिक विमर्श से जोड़कर उन्होंने उसे विस्मयकारी ढंग से लोकप्रिय बना दिया था.

अध्यवसाय, स्पष्टता और सौष्ठव के कारण ही साहित्य के मंचों पर एक आलोचक वर्षों-बरस चाव और उत्तेजना के साथ सुना जाता रहा.साहित्य को बाज़ारवाद और दक्षिणपंथी सोच से बचाने और उसे प्रगतिशील मूल्यों से जोड़कर प्रखरता देने के क्रम में वे कई मोर्चों पर एक साथ सक्रिय रहे. ‘आलोचना’ पत्रिका ने इस तरह के विमर्श को जगह दी वहीं उनके हिंदी विभाग (जेएनयू) ने विवेकवान शिक्षक समाज को दिए. साहित्य की कई पीढ़ियों को उन्होंने सहेजा और संवारा.

एक तरह से यह नामवर-समय है.आज जब वे नहीं हैं उनकी कृतियाँ यह काम करती रहेंगी. उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उनकी परम्परा का विकास हो, आलोचना और जीवंत हो, अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से कभी विमुख न हो तथा एक स्वतंत्र शास्त्र के रूप में वह विश्व में उल्लेखनीय बने.नामवर जी के मार्क्सवाद के पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ लिखा गया है. उस पर मैं कुछ नहीं कहूँगा.

हिंदी का अच्छा आलोचक होना इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह मार्क्सवादी है या नहीं है. हिंदी में पहले भी ऐसे आलोचक हो चुके हैं जो मार्क्सवादी नहीं थे, आचार्य शुक्ल, आचार्य द्विवेदी, नन्द दुलारे वाजपेई आदि. निर्द्वन्द्व और निर्भ्रांत रूप से कहा जा सकता है कि ये लोग बड़े आलोचक हैं.नामवर सिंह की साहित्य से अटूट प्रतिबद्धता है और यही प्रतिबद्धता उनकी आलोचना की ताकत है.

इस प्रतिबद्धता से साहित्य के संबंध में उनकी जो दृष्टि बनती है उसे लेकर मतभेद तो है पर उसके महत्त्व को ख़ारिज नहीं किया जा सकता है. नामवर जी की आलोचना दृष्टि का सबसे पहला पता उनकी छायावाद नामक पुस्तक से लगता है. इसमें कविता की साहित्यिकता की व्याख्या और पहचान है. छायावाद की कविता को समझने में इसके महत्व को सबलोग स्वीकार करते हैं. इसमें भी साहित्य से जुड़ने का भाव ही अधिक है. उनकी दूसरी किताब कहानी और नई कहानी है.

उन्होंने इसमें कहानी की शास्त्रीय और प्राध्यापकीय आलोचना को तोड़ कर पहली बार हिंदी में कहानी की गम्भीर आलोचना की शुरुआत की है.नामवर सिंह अत्यंत पढ़े लिखे आलोचक हैं. इतना बहुपठित मैं हिंदी में सिर्फ रामचंद्र शुक्ल को पाता हूँ. समकालीन दुनिया की आलोचना से वह पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के माध्यम से जुड़े रहे हैं. इसका असर उनकी आलोचना दृष्टि से लेकर उनकी भाषा तक पर है.

कहानी और नई कहानी में कहानी की आलोचना की जो प्रक्रिया और पद्धति है उसमें एक ताज़गी है. आज भी उनके मूल्यांकनों से यदा कदा मतभेद होते हुए भी उनको खारिज़ नहीं किया जा सकता.उनकी आलोचना का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव कविता के नए प्रतिमान है. इसकी आलोचना भी हुई है. नामवर सिंह के प्रसंग में मुझे जार्ज लुकाच की याद आती है. उन्होंने अपने जीवन में अपनी कई किताबों को disown किया. उसी तरह नामवर सिंह ने अपनी कई किताबों और मान्यताओं को disown किया है.

इनमें उनकी दो महत्वपूर्ण किताबें हैं- एक तो इतिहास और आलोचना और दूसरी किताब कविता के नए प्रतिमान. पर मैं D.H. Lawrence की उस बात पर विश्वास करता हूँ कि कहानी पर विश्वास कीजिए कहानीकार पर नहीं. तो नामवर सिंह के own, disown को छोडकर उनकी कविता के नए प्रतिमान को ध्यान में रखें तो पाएंगे कि उसका मूल्य उसके विवादास्पद होने में ही है.

नामवर जी ने उसमें दो तरह के विवाद किए है – एक विवाद डॉ. नागेन्द्र और उनकी आलोचना दृष्टि और इनकी कविता संबधी समझ से है, दूसरा विवाद अज्ञेय की कविता से है.नागेन्द्र के संदर्भ में नामवर सिंह रामचंद्र शुक्ल को ध्यान में रखते हैं और अज्ञेय के प्रसंग में मुक्तिबोध को रखते हैं. हिंदी आलोचना में विचारों के विकास में बहस की भूमिका की अगर किसी दिन खोज़ और खबर ली जायेगी तो कविता के नए प्रतिमान का यह योगदान स्वीकार किया जायेगा.

कविता के नए प्रतिमान की शुरुआत रामचंद्र शुक्ल के प्रसिद्ध निबन्ध कविता क्या है से होती है.ऐसा लगता है जैसे नामवर सिंह यह चाहते हो कि रामचन्द्र शुक्ल ने कविता के जैसे नए प्रतिमान बनाए उसी तरह की उम्मीद इस किताब से भी की जाए. बाद में खुद नामवर सिंह ने यह स्वीकार किया कि उसमें इस तरह का कोई नया प्रतिमान नहीं है.

उनका आखिरी महत्वपूर्ण कार्य है दूसरी परम्परा की खोज. इसकी भाषा बहुत ही सृजनशील है. नामवर सिंह की भाषा बहुत ही जानदार है और इसी लिए वह असरदार आलोचना लिखते हैं और बोलते हैं. नामवर सिंह की आलोचना की भाषा पर उनकी वक्तृता का गहरा असर है.

दूसरी परम्परा की खोज में हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना और रचनाशीलता की नई व्याख्या की कोशिश है, पर रामचन्द्र शुक्ल के महत्व को कम करने के लिए इसमें जो तर्क दिए गए है वह गले नहीं उतरते. कुल मिलाकर उनकी आलोचना में साहित्य के प्रति जो प्रतिबद्धता है वही मुझे मूल्यवान लगती है.

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