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बाटला हाऊस फिल्म नहीं, राजनीतिक षड़यंत्र

रिहाई मंच अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा. कि 19 सितंबर 2008 को दिल्ली की घनी आबादी बाटला हाऊस में दिल्ली क्राइम ब्रांच द्वारा किए गए एनकाउंटर में दो युवा मारे गए और कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमा हुआ। इस मुकदमे के सह अभियुक्त मोहम्मद आरिफ के विरुद्ध दिल्ली न्यायालय में परीक्षण विचाराधीन है। उक्त मुकदमे में साक्षियों का बयान अंकित किया जा रहा है। इस दरमियान बाटला हाउस नामक फिल्म का रिलीज़ होना न्याय के विरुद्ध है।

यदि साक्षी अथवा पीठासीन अधिकारी उक्त फिल्म को देखेंगे तो उनके पूर्वाग्रह से ग्रसित होने की संभावना है। यदि साक्षी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर बयान अंकित कराएंगे अथवा उसी आधार पर निर्णय पारित किया जाएगा तो उससे न्याय होने की आशा नहीं होगी। इन विषम परिस्थितियों में जरूरी है कि न्यायिक प्रक्रियाओं को निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से होना सुनिश्चित किया जाए तथा मुकदमे के विचाराधीन रहने तक बाटला हाऊस फिल्म को रिलीज ना होने दिया जाए और उसे प्रतिबंधित किया जाए।

रिहाई मंच नेता रॉबिन वर्मा ने कहा कि बाटला हाऊस जैसी बंबइया मसाला फिल्में आम जनता के बीच फर्जी इनकाउंटरों को सही साबित करने के लिए बनाई जाती हैं। उन्होंने कहा कि इससे पहले भी फिल्म के सह निर्माता जॉन अब्राहम मद्रास कैफे जैसी विवादास्पद फिल्म बना चुके हैं। यह ट्रेंड बन चुका है कि बिना पीड़ित परिवारों से परामर्श किए विवादित फिल्में बनायी जायें, लोगों को आधी-अधूरी जानकारी दिखाई जाए और अकूत धन कमाया जाए। हम माननीय न्यायालय, सेंसर बोर्ड और सरकार से मांग करते हैं कि जब तक बाटला हाऊस मुकदमे के सह अभियुक्त मोहम्मद आरिफ के विरुद्ध दिल्ली न्यायालय में परीक्षण विरचाधीन है तब तक इस फिल्म को रिलीज ना होने दिया जाए।

 

 

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