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क्या हत्या के नाम पर जश्न मनाने के त्योहार हैं दीवाली, दशहरा और होली?

चन्द्र भूषण सिंह यादव

क्या भारतीय बहुजन समाज उधार के त्यौहारों पर फिजूलखर्ची नही कर रहा है?यह अहम सवाल हमे सोचने को विवश करता रहता है क्योकि हम उन्ही तारीखों को अपना पर्व-त्यौहार मानकर हजारों-लाखों रुपये उड़ा डालते हैं तथा दान-दक्षिणा के नाम पर कूड़ेदान में फेंक आते हैं जो हमारी गाढ़ी कमाई का लूट है और हमारी दासता का परिचायक।

दुनिया मे किसी धर्म का त्यौहार हत्याओं के जश्न पर शायद ही आधारित हो लेकिन हिन्दू धर्म हत्याओं के जश्न पर त्यौहार मनाता है,यह एक अजूबा ही है।हम भी इस पर खुश होते हैं,पकवान बनाते हैं,फुलझड़ियां छोड़ते हैं लेकिन कभी विचार नही करते हैं कि ऐसा क्यों होता है?वे कौन लोग हैं जिनका कथित रूप में राक्षस/असुर/दानव कह वध किया गया है?

महिषासुर,रावण व हिरणकश्यप की हत्या पर दशहरा,दीपावली व होली का प्रमुख त्यौहार मनाया जाता है।सवाल उठता है कि महिषासुर,रावण और हिरणकश्यप कौन थे?इनकी हत्या का कारण क्या था?इन कथित राक्षसों के वध हेतु भगवान को क्यो अवतरित होना पड़ा?आज भगवान क्यो अवतरित नही हो रहे हैं?

दशहरा के त्यौहार का एक कारक महिषासुर तो दूसरा रावण है।आखिर महिषासुर कौन था?महिषासुर की विशालकाय प्रतिमा मैसूर में आज भी खड़ी है।इतिहास कहता है कि मैसूर राज्य पर अहीर राजवंश शासन करता रहा है।आज भी वहां वाडियार राजा हैं जो यादव हैं।अब सवाल उठता है कि महिषासुर कौन था?क्या मैसूर नाम उसी महिसुर या महिषासुर के नाम पर तो नही पड़ा है?घनी मूछें, बलिष्ट शरीर,भैंस आदि क्या अहीरों से मैच नही करते है?आखिर महिषासुर का कसूर क्या था कि उसका वध कर आज भी जश्न मनाया जाता है?मैसूर के राजा महिषासुर को कोई सुर/देवता मर्द क्यो परास्त नही कर सका कि एक स्त्री को नौ दिन के कठिन यत्न के बाद दसवें दिन हत्या करने का अवसर प्राप्त हुआ?क्या यह महिषासुर-दुर्गा युद्ध आर्य-अनार्य संघर्ष प्रतीत नही होता है?

दशहरा का दूसरा मतलब राम द्वारा रावण का वध है।आखिर रावण कौन था?उसे क्यो मारा गया?आचार्य चतुरसेन ने “वयं रक्षामह” में स्पष्ट लिखा है कि राम-रावण युद्ध आर्यबल की अनार्य बल पर जीत है।राहुल सांकृत्यायन ने पुष्यमित्र शुंग को ही राम कहा है।खैर रावण को राक्षस कहा गया है तो वह क्या था,यह विचारणीय है।आर्यो द्वारा लिखे ग्रन्थों के अनुसार रावण महान विद्वान था।उसे ग्रह-नक्षत्र विज्ञान की खूब जानकारी थी।उसका राज्य धनधान्य पूर्ण था।उसके राज्य में सबके घर सोने के बने थे अर्थात समृद्धि हिलोरे मार रही थी।रावण के पास विमान था अर्थात विज्ञान तरक्की पर था।वह स्वर्ग में जाने हेतु सीढ़ी बनाने वाला था अर्थात जैसे आज चन्द्र-मंगल पर जाने हेतु इंसान प्रयत्नशील है वैसे ही रावण भी अपनी प्रयोगशाला में ऐसे उपकरण बनाने की तरफ अग्रसर था।उसके राज्य में कहीं भी अंधविश्वास का वास नही था।अपनी बहन सूर्पनखा के नाक-कान काटे जाने के बाद रामचन्द्र जी की पत्नी सीता का हरण कर उन्हें अपने सबसे खूबसूरत बाग अशोक वाटिका में दास-दासियों की सुविधा के साथ रावण ने रखकर एक नेक इंसान की तरह सलूक किया था।वह अपने राज्य में यज्ञ,होम,श्राद्ध आदि बन्द करवा रखा था।प्रजा सुखी थी इसलिए वह राक्षस था जबकि राम के पास महल था और प्रजा बनवासी,पर्णकुटी में रहने वाली दीन-हीन थी।

राम सिंहासन पर खड़ाऊं रख 14 वर्ष राज करवाये थे।बालि को छिपकर मारने के बाद भी राम योद्धा थे।सूर्पनखा स्त्री का नाक-कान कटवाने के बाद भी वे पुरुषोत्तम थे।विभीषण को मिलाकर रावण को मारने के बाद भी वे न्याय प्रिय थे।निर्दोष अहीरों के राज्य द्रुमकुल्या का समूल नाश करने के बाद भी रामचन्द्र जी आदरणीय हैं।अग्निपरीक्षा के बाद भी सीता को गर्भवती होने के बाद जंगल मे छोड़वा देने के बाद भी राम जी मर्यादा के पालनहार हैं।निर्दोष शम्बूक का गर्दन काटने के बाद भी रामचन्द्र जी पुरुषोत्तम हैं।ऐसे महापुरुष राम द्वारा रावण की हत्या का जश्न दशहरा है जिसमे आज भी रावण का पुतला जलाया जाता है।

होली का त्यौहार हिन्दू धर्म का एक प्रमुख पर्व है।यह कथित असुर हिरणकश्यप की हत्या पर आधारित है।हिरणकश्यप कौन था?हिरणकश्यप का गुनाह क्या था?हिरणकश्यप को विष्णु ने कथित नरसिंह बन उसके बेटे प्रह्लाद की मदद से घर मे घुसकर छिपकर मार डाला था।आमने-सामने के युद्ध मे हिरणकश्यप को कोई परास्त नही कर सकता था।हिरणकश्यप इस देश का मूलनिवासी राजा था जो असुर राज दिति का पुत्र था।हिरणकश्यप का पुत्र प्रह्लाद,प्रहलाद का पुत्र विरोचन,विरोचन का पुत्र बलि,बलि का पुत्र बाणासुर और बाणासुर की पुत्री उषा थी।

उषा की शादी कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध से हुई थी।यदि शास्त्र-पुराण सत्य हैं तो अहीरो की उत्पत्ति हिरणकश्यप की परपोती उषा और कृष्ण के पोते अनिरुद्ध से होनी सिद्ध है।ऐसे में हिरणकश्यप का रिश्ता पिछड़े वर्ग की एक प्रमुख जाति अहीर से सिद्ध होती है।अब बात हिरणकश्यप की,कि उसका कसूर क्या था कि उसे सिंह का मुखौटा लगा विष्णु को मारना पड़ा?हिरणकश्यप के कसूर के बारे में जिक्र है कि वह विष्णु को भगवान नही मानता था।वह विष्णु की अधीनता नही स्वीकारता था।उसका कहना था कि मैं विष्णु को हरि या भगवान नही मानूँगा क्योकि विष्णु इस योग्य नही है।सवाल उठता है कि विष्णु में ऐसी कौन सी बात थी कि हिरणकश्यप उनकी अधीनता स्वीकार करने को तैयार नही हुवा।

आप गूगल पर जाइये और विष्णु-बृंदा लिखिए,आप विष्णु-तुलसी लिखिए फिर पाएंगे कि विष्णु ने जालन्धर को परास्त न कर पाने की दशा में जालन्धर का वेश पकड़ जालन्धर की पत्नी का शीलभंग किया, शंखचूड़ का भेष बना शंखचूड़ की पत्नी तुलसी का सतीत्व भंग किया।अब ऐसे इंसान को कोई भी तर्कशील,सदाचारी,चरित्रवान व्यक्ति भगवान नही मान सकता है जो परस्त्रीगमन किया हो।हिरणकश्यप भी विष्णु को भगवान मानने से इनकार कर दिया लिहाजा हिरणकश्यप को छल से मारा गया और उसकी बहन होलिका को जलाकर खाक कर दिया गया।हिरणकश्यप को मारने व होलिका को जलाने का जश्न होली के रूप में मनाया जाता है और इस अवसर पर आज भी होलिका को गांव-गांव जलाया जाता है।

इस प्रकार रावण को मारने के बाद अयोध्या वापस लौटने की खुशी में पूरा देश दीपक जलाता है,पटाखे फोड़ता है और भन्नाभिन्न पकवान बनाकर भोग लगाता है।सूर्पनखा स्त्री का नाक-कान काटने,एक समुन्नत देश सोने की लंका को जलाने,एक न्यायप्रिय/विद्वान/वैज्ञानिक/चरित्रवान राजा रावण को मारने की खुशी में हम दशहरा व दीवाली मनाते हैं जबकि एक योग्य,बहादुर व आर्यो की अधीनता न स्वीकारने वाले राजा महिषासुर को छल से स्त्री द्वारा मरवाने की खुशी में भी यह दशहरा मनाया जाता है।होलिका को जलाने व हिरणकश्यप को मारने की खुशी का त्यौहार होली है।

भारत मे भगवानों का अवतरण भी तभी हुआ है जब यहां के मूलनिवासियो से लड़ना हुवा है।ये भगवान बामन या नरसिंह रूप में गोरी,गजनी,अंग्रेजो,डचों,पुर्तगालियों के आने पर नही अवतरित हुये हैं।ये भगवान चीन, पाकिस्तान,बंगलादेश का विनाश करने के लिए नही जन्म ले रहे हैं।ये होलिका,सूर्पनखा,रावण,महिषासुर या हिरणकश्यप के बारी ही अवतार लिये हैं क्योकि वे लोग इस देश के मूलनिवासी,अनार्य लोग थे।इन लोगो ने आर्यो की अधीनता स्वीकारने से इंकार किया था इसलिए इन्हें छल से मारने हेतु इनके कथित अवतार हुये।
अब सवाल है कि हम इन चीजों को जानते क्यो नही,जानते हैं तो मानते क्यो नही?

क्या हम बहुजन लोग आज भी मानसिक तौर पर गुलाम नही हैं जो अपने पुरखों की हत्या का जश्न मनाकर प्रसन्न हो रहे हैं।अपने पुरखों की मौत पर उन्हें मारने वालो की संतानों को हम दान-दक्षिणा देकर हम आज भी दासत्व का पालन नही कर रहे हैं?आज जब हम पढ़-लिख रहे हैं,यथार्थ जानने लगे हैं,तर्क की शक्ति पैदा हो गयी है तो भी क्यो हम इन पर्वों को मना रहे हैं?

वास्तव में हमारे पर्व-त्यौहार कौन से हैं?हमें कब गम और कब खुशी मनानी चाहिए यह हम कब समझेंगे?जो तिथियां हमारे पुरखो के बलिदान की तिथियां हैं उन तिथियों पर जश्न क्या मुनासिब है?हमे जब सामाजिक गुलामी से मुक्ति मिली या हमे सामाजिक गुलामी से मुक्ति हेतु जिन बहुजन महापुरुषों ने योगदान दिया उनकी जयन्तियां हमे पता हैं?

क्या हमें अपने पर्व-त्यौहार नए सिरे से गढ़ने होंगे?बहुजन बुद्धजीवियों के समक्ष यह सवाल छोड़ते हुये उन तमाम बहुजन साथियों को “अत्त दीपो भवः” की बुद्ध की अमूल्य लाइन समर्पित है जो मुझे हिन्दू पर्व-त्यौहारों पर बधाइयां भेजते हैं।
ज्ञान की जय!विज्ञान की जय!सँविधान की जय!

( ये लेखक के अपने विचार हैं )

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