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ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया……

ध्रुव गुप्त

ग़ज़ल गायिकी की विधा को जिन कुछ लोगों ने जान और हुस्न बख़्शा, उनमें अख्तरी बाई फैजाबादी उर्फ़ बेग़म अख्तर का नाम सबसे पहले आता है। पिछली सदी के तीसरे दशक में जब उन्होंने संगीत की महफ़िलों में शिरक़त शुरू की, वह दौर वह उस ज़माने की बेहतरीन गायिकाओं – गौहर जान और जानकी बाई छप्पनछुरी के अवसान का दौर था।

अपनी अलग आवाज़, शालीनता और मंचों पर अपनी गरिमामयी उपस्थिति की वज़ह से कम वक़्त में ही बेगम अख्तर ग़ज़ल, ठुमरी और दादरा गायन में हिन्दुस्तान की सबसे बुलंद आवाज बन गईं। आवाज़ की तासीर ऐसी जैसे आधी रात को दूर किसी वीराने से आहिस्ता-आहिस्ता उनींदी-सी कोई आवाज़ उठ रही हो।

रूह से उठती एक आवाज़ जो रूह को छूकर गुज़र जाए ! ग़ज़ल गायकी में उनकी कोई मिसाल आज भी नहीं मिलती। सिर्फ पंद्रह साल की उम्र में ही अपने संगीत कार्यक्रमों से उन्हें देशव्यापी शोहरत मिली तो फिल्मवालों का ध्यान उनकी तरफ गया।

उन्होंने अख्तरी बाई फैजाबादी के नाम से 1933 से 1943 तक मुमताज़ बेग़म, जवानी का नशा, अमीना, नल दमयंती, नसीब, अन्ना दाई, और रोटी जैसी कुछ फिल्मों में अभिनय किया। अपनी फिल्मों में अपने तमाम गाने उन्होंने खुद गाए थे। बाद में गायिका गौहर जान से प्रभावित होकर उन्होंने अभिनय को अलविदा कहा और खुद को गायन के प्रति समर्पित कर दिया।

1945 में शादी के बाद पारिवारिक परंपराओं के दबाव में उन्हें गायिकी से तौबा करनी पड़ी। अपने स्वभाव और शौक़ के विपरीत बंद जीवन ने उन्हें इस क़दर बीमार कर दिया कि उनके ससुराल वालों को अंततः उन्हें लखनऊ रेडियो स्टेशन में गाने की अनुमति देनी पड़ी। फिर क्या था, बेग़म अख्तर के नाम से उनकी ग़ज़लों, ठुमरी और दादरा का जो सफ़र रेडियो से शुरू हुआ, वह समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में आंधी की तरह पहुंच गया। शक़ील बदायूंनी उनके सबसे प्रिय शायर थे जिनकी कई ग़ज़लों ने उनकी आवाज़ में लोकप्रियता का शिखर छुआ।

1974 में अपनी मौत तक बेगम अख्तर ने खुद को ग़ज़ल की सबसे ज़रूरी और सबसे मकबूल आवाज़ के रूप में स्थापित कर लिया था। उनकी कुछ कालजयी ग़ज़लें हैं – ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया, दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दो, ये जो हममें तुममें करार था तुम्हें याद हो कि न याद हो, कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया, उलटी हो गईं सब तदबीरें, इश्क़ में गैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया, मेरे हमनफस मेरे हमनवां मुझे दोस्त बनके दगा न दे, अपनों के सितम हमसे बताए नहीं जाते, उज्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं, लाई हयात आए कज़ा ले चली चले, दिल की बात कही नहीं जाती, छलकते हुए सागर नहीं देखे जाते।

मलिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख्तर के यौमे पैदाईश (7 अक्टूबर) पर उन्हें खेराज़-ए-अक़ीदत, एक शेर के साथ ! जब भी कम होंगी उम्मीदें, जब भी घबड़ाएगा दिल आपकी आवाज़ के पहलू में सो जाएंगे हम !

(लेखक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं)

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