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एक महीने बाद भी कश्मीर खुली जेल जैसा

ज़ैगम मुर्तज़ा 

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद लगी बंदिशों को एक महीना हो चुका है लेकिन अभी तक हालात क़ाबू से बाहर हैं। सरकार का दावा है कि सबकुछ ठीक है और 90{661b0ba868329a52c8af95963c075a5773c0dcbc6fe85c78bf6ba5d7db9a70a8}जगहों पर हालात सामान्य हैं लेकिन बेहद सामान्य सा ज्ञान रखने वाले भी मानने को तैयार नहीं है कि जम्मू कश्मीर, ख़ासकर घाटी में चीज़े अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही हैं।

4 सितंबर को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 ख़त्म हुए पूरा एक महीना हो जाएगा। राज्य में अलगाववादी छोड़िए, मुख्यधारा और भारत समर्थक राजनीतिक पार्टियों के भी तमाम नेता जेल में हैं। हालांकि इनमें सज्जाद लोन का मामला संदिग्ध है। सज्जाद लोने के समर्थकों का दावा है कि उन्हें भी गिरफ्तार किया गया है लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि वो सरकार के नाक और काम हैं। बहरहाल ज़्यादातर इलाक़ो में संचार सुविधाएं अभी भी बहाल नहीं हुई हैं। लोगों की आवाजाही पर अभी भी पाबंदियां हैं। ऐसे में जो थोड़ी बहुत ख़बरें आ रही हैं वो उन लोगों के ज़रिए ही निकल पा रही हैं जो कश्मीर से किसी तरह दिल्ली आ पाए हैं।

कश्मीर घाटी से दिल्ली लौटे लोगों का कहना है कि हालात कारगिल और लेह जैसे इलाक़ों में भी सामान्य नहीं है जहां सरकार की उम्मीदों के ख़िलाफ पहली बार लोग सड़कों पर उतरे हैं। केंद्र सरकार को उम्मीद थी कि इस इलाक़े में लोग उसका साथ देंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कारगिल के लोगों में ग़ुस्सा सिर्फ राज्य के विभाजन पर नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व ही ख़त्म हो गया है। कारगिल की क़रीब 65{661b0ba868329a52c8af95963c075a5773c0dcbc6fe85c78bf6ba5d7db9a70a8} आबादी शिया है। पिछले लोकसभा चुनाव में वोटर लिस्ट से ज़्यादातर लोगों ने वोट ग़ायब होने की शिकायतें की थीं। इसके बाद यहां से बीजेपी की जीत हुई। अब विधानसभा ख़त्म हो जाने से उन्हें एकमात्र विधायक की सीट भी नहीं मिलेगी। इसके अलावा स्थानीय लोग जनजाति के तौर पर पहचान की मांग कर रहे हैं।

इस बीच दिल्ली में ख़बर है कि राज्यपाल सत्यपाल मलिक के बदले नृपेंद्र मिश्रा को कश्मीर भेजा जा सकता है। लेकिन कश्मीर का भविष्य क्या होगा इसे लेकर अभी भी तमाम तरह की क़यासबाज़ियां हैं। राज्य में केंद्र सरकार जल्द से जल्द चुनाव कराना चाहेगी ताकि हालात सामान्य नज़र आएं, लेकिन अभी नया परिसीमन एक चुनौती होगा। हो सकता है दिसंबर या जनवरी में आधी अधूरी तैयारियों के साथ चुनाव करा दिए जाएं क्योंकि बर्फबारी और ठंड में विरोधियों के बाहर निकलने का ख़तरा कम हो जाता है।

अभी तक सरकार ने जो कुछ किया है उसमें सबसे बड़ा नुक़सान मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों को किनारे करने से हो सकता है। आख़िर ये तमाम पार्टी और नेता ही तो कश्मीरी अवाम को भारत के साथ जोड़ रहे थे। आज सरकार लाख दावे करे कि इन नेताओं पर से स्थानीय लोगों का विश्वास उठ गया है लेकिन वो ये बताने कि स्थिति में नहीं है कि लोग किस पर विश्वास कर रहे हैं या करेंगे? ज़ाहिर है राजनीतिक शून्य का फायद अलगाववादियों को ही मिलेगा। उनकी इस बात को लोगों में और मज़बूती मिलेगी कि देखो हम न कहते थे सरकार धोखा दे रही है।

बहरहाल, जम्मू कश्मीर अभी शांत है। शांत इसलिए है कि पूरा इलाक़ा एक काली चादर में ढका है। इस काली चादर से छनकर न लोगों तक रौशनी पहुंच रही है और न उधर से इधर कुछ ख़बर आ रही है।

इस एक महीने के तक़रीबन कर्फ्यू जैसे हालात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि लोगों का क्या हाल होगा। खाना, दूध, पानी जैसी ज़रूरत की चीज़ें लोगों को कैसे मिल रही होंगी, सर्दियां आने से पहले लोग राशन कैसे जुटा पाएंगे, शिक्षा, दवा और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाओं के बिना लोग कैसे जी रहे हैं, बिना इंटरनेट, टीवी के लोग घरों में कैसे रह पा रहे हैं, ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो कश्मीर के बाहर हर आदमी के ज़हन में हैं। फिल्हाल जो सरकार कह रही है वही सही है। लेकिन दिल्ली में बैठकर लगता है कश्मीर इस समय देश की सबसे बड़ी जेल है और सभी लोग क़ैद में हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां राजधानी में बैठकर ऐसा जीवन जीने के बारे में हम सोच भी नहीं सकते हैं।

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