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ओ भाईजान ! वक़्त है संभल जाओ, वर्ना बहुत देर हो चुकी होगी

मुहम्मद ज़कारिया खान
@i_am_zakariya
एक बड़ी समस्या है, इस मुल्क के मुसलमानों के साथ, मुस्लिम लीडरशिप उन्हें पसंद नही . सेकुलर लीडरशिप उन्हें पसंद नहीं. तो भाई फिर पसंद क्या है ? जब बात आती है, कि संसद और विधानसभा में अपनी आवाज़ उठाने वाले लीडर्स को चुनों तो तुम उस वक़्त सबसे बड़े चुनावी विश्लेषक बन जाते हो. इसको वोट देंगे तो वो जीत जाएगा, फलां जीत जाएगा. पर वोट देने घर से बाहर नहीं निकलेंगे.
 
एक बात याद रखना,  इस मुल्क के सियासी निजाम में जो सियासत में हिस्सा सिर्फ चुनाव लड़कर नहीं लिया जाता, बल्कि अपना वोट डालकर भी सियासत में हिस्सा लिया जाता है. तुम्हें अपने वोट की वैल्यू नही पता. जितने तुम्हारे वोटर्स हैं, उसमे से आधे सिर्फ वोट देने जाते हैं, कई तो अपने नाम भी नहीं जुडवाते . फिर कहते हैं फलां जीत गया, ये हो गया, वो हो गया.
 
ओ भैया ! ये एक लोकतांत्रिक मुल्क है, लोकतंत्र में आपके वोट की कीमत होती है. जुबानी लफ्फाजी की नहीं. तुम्हारे सियासी हालात नहीं सुधर सकते जब तक तुम अपने सियासी हालात को ठीक करने के लिए जाग नहीं जाए.
 
सोच रहे होगे, कि मैं किन सियासी हालात की बात कर रहा हूँ,
 
तो सुनो !
तुम न सिर्फ एक गैरज़िम्मेदार वोटर हो बल्कि दुनिया में सबसे ज्यादा बेहिसी की ज़िंदगी जीने वाले लोग भी तुम्ही हो. तुम पिट रहे हो, तुम कूटे जा रहे हो. पर तुम्हारी बेहिसी का आलम ये है कि, इस बेईज्ज़ती की वजह को तलाश कर सुधार नही कर रहे हो.
 
तुम्हे नौकरी चाहिए ! आरक्षण चाहिए ! पर ज़रा बताना तो कितने दुनियावी तालीम के इदारे तुम्हारी दीनी जमातें चला रही है.
अरे दुआ दो उस सर सय्यद अहमद खान को, जिनकी मेहनत से आज तुम्हारे पास कम से कम AMU जैसा इदारा तो है. बताओ तो ज़रा पूरी एक सदी से ज्यादा वक़्त गुज़र गया, कितनी यूनिवर्सिटी बनी, कितने मेडिकल कालेज बने.
 
ऐसा नही कि तुम्हारे पास पैसा नहीं, तुम्हारे पास ज़मीन नहीं.सब कुछ दिया है अल्लाह तआला ने तुम्हे. पर तुम खर्च करना चाहते नहीं. वक़्त है सुधर जाओ.
 
सियासी तौर पर, सामाजिक तौर पर बशऊर हो जाओ. अब अगर नहीं समझे और संभले तो बहुत देर हो चुकी होगी.
  ( लेखक  Tribunehindi.com के फ़ाऊँडर व सक्रीय ब्लॉगर हैं )