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   सोने की गाय में बदलता एक देश- मनोज कुमार पांडेय

(इधर एक जिद सी पैदा हुई है भीतर कि उन चीजों पर लिखा जाय जो अभी घटित हो रही हैं। इनका कहानी के रूप में मूल्यांकन कैसा होगा मुझे पता नहीं। यह कहानी मानी जाएँगी कि नहीं यह भी नहीं पता। पर यह पता है कि इस सीरीज में मैं अभी बहुत सारी कहानियाँ लिखने वाला हूँ।)

                                                         

यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। आप हमसे बेहतर जानते हैं कि इसका हमारे देश में घट रही घटनाओं से कोई लेना देना नहीं है। इस कहानी का लेखक चौबीस कैरेट का देशभक्त है और गाय को अपनी माता मानता है। वह दिन में कम से कम पाँच बार पाकिस्तान को गाली देता है तथा नियमित रूप से पतंजलि पंचगव्य का उपयोग करता है।

कहीं बहुत दूर बसे देश  में एक जानवर होता था जिसे लोग गाय कहते थे। गाय एक सीधा सादा जानवर था। इसे लोगों ने बहुत पहले ही साध लिया था। यह घास खाता था और पानी पीता था। कभी कभी इसे खुश करने के लिए लोग अपने घरों के जूठन भी इसे दे आते थे। यह और खुश हो जाता था था। कुछ लोग इसे पवित्र जानवर मानते थे। वे अपने भोजन का पहला ग्रास हमेशा गाय के लिए निकालते और एक पवित्रता से भर जाते। गाय उस ग्रास को देर तक मुँह में चुभलाती रहती। अक्सर यह ग्रास उसके गले में चिपक जाता जिसे भीतर करने के लिए उसे भूसा खाना पड़ता। गाय भूसा खाते हुए इंतजार करती कि लोग आएँ और उसे दुहें। लोग गाय को माता मानते थे और उसके दूध को अमृत। माता का दूध अमृत होता है यह बात तो वह बछड़ा भी जानता था जो दूर बँधा दूध के लिए हुड़कता रहता था। यह बात गाय भी जानती थी पर उसे बताया गया था कि वह महान है और महानता हमेशा त्याग माँगती है।

इस देश के बच्चों के इम्तहानों में अक्सर एक निबंध लिखने के लिए आता। इस निबंध का शीर्षक होता – ‘ एक कृषि प्रधान देश है’। यह निबंध कमजोर बच्चों को भी अक्सर जुबानी याद होता। वैसे भी इस निबंध के लिखने में किसी को कोई मुश्किल नहीं आती थी। एक कृषि प्रधान देश था यह इससे भी साबित होता था कि इस देश में किसान बड़ी संख्या में रहते थे। किसान बड़ी संख्या में रहते थे यह इससे पता चलता था कि देश में आत्महत्या करने वाली सूची में किसान नंबर एक पर थे। बाकी दुनिया में लोग अचरज में थे कि इस देश में किसान आखिर कितनी बड़ी संख्या में रहते हैं कि रोज रोज मरते रहने के बावजूद समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। इससे भी साबित होता था कि यह एक कृषि प्रधान देश था। यह इस बात से भी साबित होता था कि कई बार लोग गाय लिखते हुए किसान और किसान लिखते हुए गाय लिख देते थे और इससे अर्थ पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता था।

जबकि दूसरी चीजों के मामले में यह अर्थ का मामला बदल जाता था। किसी को शेर कहो तो वह खुश हो जाता था जबकि शेर गाय खाता था और दूसरी तरफ किसी को गाय कहो तो उसे माता मानने वाले लोग भी आँखें तरेरते थे। गाय कहा जाने वाला व्यक्ति प्रेम या श्रद्धा से देखे जाने की बजाय दया से देखा जाता था। फिर भी लोगों को गाय बहुत पसंद थी।

बहुतों को तो विवाह करने के लिए भी गाय ही चाहिए होती थी। यह अलग बात है कि यह गाय भी कभी कभी सींग या लात मारती थी पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। लोग उसकी नाक में छेद करके नकेल डाल देते और पैरों को बाँध कर उसे दुह ही लेते। कभी कभार वह और दिक्कत करती या कि दुहे जाते समय बछड़े पर उसका प्यार उमड़ आता तो पुत्र-भाव को मन में रखते हुए उस पर आठ-दस लाठियाँ बरसा दी जातीं। वह पहले से ही गाय होती। लाठियाँ खाने के बाद और ज्यादा गाय हो जाती।

एक कृषि प्रधान देश है यह बात गायों को भी पता थी। वे एक पीड़ादायी गर्व के साथ सदियों से यह बात जानती थीं कि उनके उन अभागे पुत्रों के दम पर ही कृषि प्रधान देश है जिन्हें पटक कर बैल बना दिया जाता है और फिर वे जीवन भर बैल बने रहते हैं। अक्सर उनकी आँखों में दिखाई देने वाला डँहका इसी दृश्य से पैदा होता था जो उनकी आँखों में गड़ता रहता था। फिर भी वह रोते हुए ही सही पर खुश रहतीं कि जैसे भी हो वह उनकी आँखों के सामने रहते हैं और वह जब मन करे उन्हें चाट सकती हैं। उनका मन कभी कभी उन बैलों को दूध भी पिलाने का करता था, आखिरकार वे माँ थीं और ममता की एक न समाप्त होने वाली भावना उनके भीतर हमेशा बहती रहती थी। तब उन्हें वह लाठियाँ याद आतीं जो कभी चोरी से अपनी बछिया या बछड़े को दूध पिलाने पर उन पर बरसी थीं। उन्हें बताया गया था कि चोरी करना बुरी बात है, अनैतिक है और जब माँ ही अनैतिक हो जाएगी तो उसकी उन संततियों का क्या होगा जो उसके दूध के दम पर पलती और बढ़ती हैं।

गायें अक्सर चुप रहती थीं इसका यह मतलब नहीं था कि उन्हें कुछ पता नहीं था। वे पढ़ी लिखी नहीं थीं पर उन्हें आहार चक्र के बारे में पता था। उन्हें पता था कि गाय घास खाती है। उन्हें पता था कि शेर बाघ गाय को खा जाते हैं। वे अपने ऊपर कौओं का बैठना पसंद करती जो उनकी चमड़ी में चिपके परजीवी कीड़ों को खा जाते। ऐसे ही उन्हें यह भी पता था कि बहुतेरे इनसान गाय भी खा जाते हैं। उन्हें दुख होता पर इस दुनिया में यह उनके लिए एक स्वाभाविक चक्र था। ऐसे में अक्सर वे अपनी माँओं को याद करतीं जो जब बूढ़ी हो जातीं तो अक्सर रूखा सूखा कुछ भी खाने को डाल दिया जाता। वे बैल जो बूढ़े हो जाते हड्डाए हुए अपनी मौत का इंतजार करते।

इस बीच गायों ने पाया कि यह चक्र बदल रहा था। बहुत सारे मशीनी बैल आ गए थे जिन्होंने बैलों को उनके काम से मुक्त कर दिया था। दो बैलों की कहानी में से एक बैल को निकाल बाहर कर दिया गया था। दूसरा बैल जिसका नाम किसान था वह हक्का बक्का इस स्थिति को देख रहा था और मशीनी बैल के साथ पूरी ताकत लगाकर दौड़ रहा था। शुरुआत में तो वह बहुत खुशी से दौड़ा। फिर उसे पसीने छूटे। वह हाँफने लगा और जल्दी ही बेदम होकर गिर पड़ा। उधर गायें पहले तो खुश हो गईं कि अब उनके बेटों और भाइयों को बैल नहीं बनना पड़ेगा। पर जल्दी ही उन्हें इस सच का पता चला कि स्थिति पहले से ज्यादा भयानक हो गई है। उनके बछड़ों को बाहर खदेड़ दिया गया। अब वे किसी काम के नहीं थे। उन्होंने किसानों से उनकी फसल में अपने पुरखों की मेहनत का हिस्सा माँगना शुरू कर दिया। किसान मशीनी बैलों के साथ दौड़ते हाँफते पहले ही बेदम हो चुके थे। उनके पास कुछ नहीं बचा था। उन्होंने अपने को प्रस्तुत कर दिया। बछड़े जो अभी तक उनसे लड़ने पर उतारू थे उनका माथा चाटने लगे।

गायें अभी इस घटना को समझने की कोशिश ही कर रही थीं कि उन्होंने पाया कि उनके बहुतेरे मालिकों ने जो सैकड़ों और हजारों की संख्या में गाय पालते थे बछड़ों को सुई चुभोकर मार देना शुरू किया। गायों को कँपकँपी छूट गई। यह तो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था। इससे अच्छा तो बैल बनकर खेत जोतना ही था। उधर एक दूसरी भी मुश्किल उनके सामने बड़े विकराल रूप में पसर रही थी। जब वे दूध देने लायक नहीं रहतीं तो उन्हें अपना चारा खुद जुटाने के लिए बाहर खदेड़ दिया जाता। वे इधर उधर भटकती रहतीं। उन्हें कई कई दिनों तक चारा नसीब न होता। वे माँ थीं, इस तरह की बातों पर शिकायत करने का उन्हें कोई हक नहीं था। वे करती भी नहीं थीं। पर कई बार भूख जोर मारती तो सड़कों पर, कूड़ाघरों की तरफ निकल जातीं और भक्ष्य-अभक्ष्य जो भी मिलता उसे खाकर अपना पेट भर लेतीं और उसे पचाने के लिए पगुराना शुरू कर देतीं। पर कई बार उनका भोजन इतना पौष्टिक होता कि वे पगुराते पगुराते जान भी दे देतीं फिर भी नहीं पचता।

देश में लोकतंत्र था और गायों को भी वोट देने का अधिकार मिला हुआ था। यह अलग बात है कि इस देश के मनुष्यों की तरह गाएँ भी भाई-भतीजावाद से ग्रस्त थीं इसलिए वह अक्सर साँड़ों को वोट देती थीं जिन्हें वह अपना प्रेमी, पति, भाई, पुत्र और संरक्षक मानती थीं। बदले में साँड़ उन्हें हर बार वचन देते थे कि वे जो कुछ भी करेंगे बस गायों के लिए ही करेंगे। गायें इस बात पर इतनी खुश हो जाती थीं कि वह तब भी पगुराती रहती थीं जब उनके पेट में घास का एक तिनका भी नहीं होता था। कहा जाता है कि कभी न कभी तो घूरे के भी दिन बदलते हैं तो वे तो गायें थीं।

अगले चुनाव में राजा पद के लिए जो प्रत्याशी अवतरित हुआ उसने कहा कि गायों के रक्षा उसके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है। भावी राजा की इस घोषणा से प्रभावित होकर लाखों ऐसे लोग सामने आए जिन्होंने गायों की रक्षा को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु वह किसी भी हद तक जा सकते थे। यह गायों के लिए बहुत खुशी के दिन थे। उनकी बड़ी बड़ी चमकती आँखों में खुशी के आँसू थे।

यह जिस देश की कहानी है वह अतीत में कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था। चुनाव के बाद नए राजा ने एलान किया कि उनका लक्ष्य देश को सोने की चिड़िया बनाना न होकर सोने की गाय बनाना है। चिड़िया मांसाहारी होती हैं। वे मासूम कीड़ों को खाकर उड़ जाती हैं। वे आदर्श प्रतीक नहीं हैं क्योंकि उन पर नियंत्रण नहीं रखा जा सकता। आदर्श प्रतीक वही हो सकता है जिस पर पूरी तरह से नियंत्रण रखा जा सके। इस लिहाज से गायें सबसे आदर्श प्रतीक हैं। इसलिए भी क्योंकि वे पूरी तरह से पवित्र हैं। पहले संतानोत्पत्ति आदि के सिलसिले में उनकी पवित्रता खंडित हो जाती थी। अब ऐसा नहीं है। अब हमारे लोगों ने यह काम पूरी तरह से सँभाल लिया है। अब उनकी नस्ल भी हमारे नियंत्रण में है। इसलिए अब हमने ठान लिया है कि हम इस देश को सोने की गाय बना कर रहेंगे।

यह एक ऐसा देश था जो आदर्श होने की तरफ बढ़ रहा था इसलिए देश की मीडिया भी पूरी तरह से जागरूक और एक पवित्र कर्तव्य-बोध से भरी थी। उसने सवाल उठाया कि सोने की गाय ही क्यों? सोने का हाथी, शेर या कि गैंडा क्यों नहीं? राजा ने कहा कि उनका भाषण गौर से सुना जाय। इस सवाल का जवाब वह पहले ही दे चुके हैं। फिर उन्होंने मजाक में कहा कि हमें एक एक सीढ़ी आगे बढ़ना है। चिड़िया से गाय तक तो ठीक है पर सीधे हाथी बहुत ज्यादा नहीं हो जाएगा! यह कहकर वे बहुत जोर से हँसे। उनके साथ मीडिया भी हँसी और कई दिनों तक हँसती रही। इस हँसी से इतना पवित्र शोर फैला कि सभी तरह की गाएँ खुशी के मारे काँपने लगीं।

नए राजा जो कहते थे वह करते भी थे। अगले ही दिन नए राजा ने एलान किया कि गायों के लिए एक नया मंत्रालय बनाया जा रहा है जो सीधे राजा के अधीन काम करेगा। उन्होंने राष्ट्रीय प्रतीक मंत्री को इस विभाग का उपमंत्री बनाया और एलान किया कि चूँकि यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है इसलिए मंत्री कभी भी उनसे विचार विमर्श कर सकते हैं। मंत्री जी ने राजा से गहन विमर्श करने के बाद तय किया कि देश भर की सभी गायों की नए सिरे से गिनती कराई जाएगी। इसके बाद गायों के जन्म और मत्यु का एक वैज्ञानिक ग्राफ बनाया जाएगा। यह ग्राफ हमेशा अपडेट होता रहे इसके लिए जरूरी है कि हर गाय को एक निश्चित संख्या दी जाय जिससे उसकी पहचान संभव हो सके। यह पहचान पत्र हर गाय के माथे पर आपरेशन के द्वारा हमेशा के लिए लगा दिया जाना था। जिससे सभी गाएँ सीधे तौर पर मंत्रालय के डाटा सेंटर से जुड़ी रहतीं। इस पहचान पत्र में गाय की नस्ल, उसके द्वारा दिए जाने वाले दूध की मात्रा, उम्र और शरीर में उपलब्ध मांस का सही सही ब्यौरा दर्ज किया जाना था।

इस महत्वपूर्ण परियोजना का ठेका राजा के एक विश्वस्त धन्ना सेठ को दिया गया जो कई पीढ़ियों से गायों के मांस, चमड़े, हड्डी आदि के व्यापार में लगा हुआ था और देश को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा दिलवा रहा था। गायों के बारे में उससे बेहतर कोई नहीं जानता, राजा ने कहा। सभी लोगों ने सहमति में सिर हिलाया और राजा की जय जयकार की। अब देश को सोने की गाय बनने से कोई नहीं रोक सकता था। धन्ना सेठ ने एलान किया कि राष्ट्रीय प्रतीक की इस महत्वपूर्ण परियोजना में राजा से वह दो हजार की एक नई नोट तक नहीं लेंगे। वे इस योजना में लगने वाली धनराशि को इसी योजना से पैदा करेंगे। इतना ही नहीं इस पूरी प्रक्रिया को वह कुछ इस तरह से संचालित करेंगे कि बड़ी संख्या में रोजगार भी पैदा हो और लोगों को इस राष्ट्रीय महत्व की परियोजना से जुड़ने का सम्मान हासिल करने का मौका मिले।

धन्ना सेठ ने मंत्री को विश्वास में लेकर सबसे पहले गौ सैनिकों की खुली भर्ती का एलान किया जो इस परियोजना को संभव बनाने वाले थे। फिर वह पहचान पत्र डिजाइन करवाया जो गायों के माथे पर आपरेशन के द्वारा लगाया जाना था। इसके बाद गौ सैनिकों को इस काम पर लगा दिया गया कि वह गायों के माथे पर एक निश्चित अवधि के भीतर पहचान पत्र लगा दें। चूँकि न तो गौ सैनिकों को इस काम का कोई अनुभव था न ही गायों को इसलिए बड़ी संख्या में गायें खेत रहीं। धन्ना सेठ ने प्रतीक मंत्री को इस चीज के लिए बधाई दी और कहा कि ये गायें कमजोर और बूढ़ी थीं इसलिए राष्ट्रीय प्रतीक होने की पात्रता नहीं रखती थीं। पर एक दूसरे तरीके से वह हमारी इस योजना के काम आएँगी। उनका मांस, हड्डी और चमड़ा बेचकर इस संसाधन के लिए धन एकत्र किया जाएगा और इन गायों को वही सम्मान दिया जाएगा जो महान देश भारत की परंपरा में दानवीर शिवि और दधीचि का है।

अगला नंबर साँड़ों का था। साँड़ों का यूँ भी खेती-किसानी में कोई काम नहीं रह गया था। बल्कि वे फसलों के दुश्मन ही थे। कई बार तो वे अपनी ताकत के नशे में गायों को भी चोट पहुँचाते थे। फिर भी गायें राजा के इस कदम से हिल गईं। जब बड़ी संख्या में साँड़ धरे-पकड़े जा रहे थे तो गायों का एक प्रतिनिधि मंडल राजा से मिलने पहुँच गया। राजा ने प्रेम और धैर्य से उनकी समस्या सुनी और कहा कि किसी भी प्रतीक को अपनी समस्या बताने या प्रतिनिधि मंडल लेकर आने का कोई हक नहीं है। फिर भी चूँकि वे उदार और लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राजा हैं इसलिए उन्होंने गायों की बात सुनी। अब गायों को भी यह जानना चाहिए कि हम यह कदम गायों की सुरक्षा के लिए ही उठा रहे हैं। हमें गौ सैनिकों से खबर मिली है कि कई जगहों पर साँड़ों ने गौ पालकों और गायों को चोट पहुँचाई है। हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते। यह ठीक है कि वे गायों के कुल से आते हैं पर वे कुलघाती हो गए हैं। उन्हें इस बात की सजा मिलेगी। उन्हें इस बात के लिए बाध्य किया जाएगा कि मरने के बाद ही सही पर वे गायों के लिए काम में आएँ।

तय पाया गया कि उनका मांस इस देश के लोग तो खा नहीं सकते क्योंकि वह माता के कुल से हैं इसलिए उस मांस को उन देशों में निर्यात कर दिया जाएगा जो उन्हें खाते हैं। इस तरह से गो कुल की हत्या का पाप भी बँट जाएगा। उनकी हड्डियों से बनी खाद खेतों में जाएगी और देश की कृषि व्यवस्था में अपना योगदान देगी। इससे उन किसानों के नुकसान की भी भरपाई हो जाएगी जिनकी फसलें इन साँड़ों ने चौपट की होंगी। किसान फायदे में आएँगे तो यह बात गायों के लिए भी फायदे की होगी। उन्हें बढ़िया चारा मिलेगा। इसी तरह इन साँड़ों की खालें गौ सैनिकों के काम आएँगी। वे इन खालों को पहनकर गायों के बीच गायों के भेस में ही मौजूद रहेंगे। यह गायों की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था होगी।

उधर गौ सैनिकों को चार पैरों पर चलने की ट्रेनिंग दी जा रही थी। उन्हें सींगों और खुरों का उपयोग सिखाया जा रहा था। मनोवैज्ञानिक एक और तरह से उन पर काम कर रहे थे। उन्हें कुछ इस तरह से ट्रेनिंग दी जा रही थी कि साँड़ की खाल पहनने के बाद वह भीतर से साँड़ जैसा महसूस करें। तब गायों के साथ उनका ज्यादा अपनापा बनेगा और वे गायों की हिफाजत के लिए न किसी की जान लेने से डरेंगे और न ही अपनी जान देने से। उन्हें बताया गया था कि उन्हें हर हाल में गायों की रक्षा करनी है, यही बात उनके लिए एकमात्र कानून और धर्म है। इसके रास्ते में अन्य जो कानून आएँ उन्हें वे बेहिचक तोड़ सकते हैं। गौ सैनिक जिस गति से यह सब सीख रहे थे और नई स्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल रहे थे बहुत संभव था कि बहुत जल्दी ही वह असली साँड़ों में बदल जाने वाले थे। मदद के लिए उन्हें नियमित तौर पर पूँछवर्धक पेय दिया जा रहा था।

उधर असली साँड़ परेशान थे। उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि उनके साथ हो क्या रहा है। वे क्रोध में इधर उधर बिफरते हुए घूमते। आखिर उन्होंने आपस में तय किया कि इतनी आसानी से हार नहीं मानेंगे। वे गौ सैनिकों के खिलाफ लड़ेंगे। पर यह लड़ाई कायदे से एक दिन भी नहीं चल पाई। साँड़ों को लड़ाई के जो तौर तरीके आते थे वह सब बेकार साबित हो रहे थे। वे पूँछ खड़ी करके नथुने फुफकारते हुए अपने पैरों से जमीन को खोदते कँपाते आगे बढ़ते कि तब तक उनका काम तमाम हो जाता। उनकी पूँछ उठती कि काट ली जाती। उनकी पूँछ से बने कई पूँछवर्धक पेय पदार्थ बाजार में उतार दिए गए थे जिनके नियमित सेवन से सदियों पहले गिर कर कहीं खो गई पूँछ फिर से उग आनी थी। असली साँड़ नकली साँड़ों से हार रहे थे।

बाद में जब गौ सैनिकों के लिए खालें कम पड़ गईं तो गायों की अनुमति से कुछ और गायों से उनकी खाल का दान माँगा गया। यह गायों की सुरक्षा का सवाल था और इसमें राजा अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखना चाहता था। गायों की हिचक पर राजा ने उन्हें बताया कि जैसे सभी युद्ध शांति की स्थापना के लिए किए जाते हैं वैसे ही गायों की रक्षा के लिए बहुत सारी गायों का मारा जाना जरूरी था जिससे कि गौ रक्षकों के लिए पर्याप्त मात्रा में गौ कवच तैयार किए जा सकें।
इस तरह से धीरे धीरे जब गायें बहुत कम हो गईं तो देश के किसानों को इस बात की छूट दी गई कि वे चाहें तो अपना पंजीकरण गाय के रूप में करा सकते हैं। इस तरह गायों को मिलने वाली सभी सुविधाएँ और सुरक्षा पा सकते हैं। बाद में राजा ने अपनी कल्याणकारी योजनाओं में इस योजना को प्रमुखता से गिनाया कि उन्होंने किसानों को गाय होने का हक दिया जो कि इस राज्य के इतिहास में पहली बार संभव हुआ है।

राजा की बातें सभी लोग अच्छी तरह से समझ सकें इसके लिए बहुत बड़ी मात्रा में गोबर चाहिए था जो लोगों के दिमागों में भरा जा सके। यह जिम्मेदारी देश की मीडिया को सौंपी गई जिसने पूरी ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दिया। उसने गोबर को तरंगों में बदल दिया था। अब यह गोबर न सिर्फ आँखों और कानों के रास्ते बल्कि सभी संभव रास्तों से इनसानी दिमागों में अपनी वाजिब जगह ले रहा था। बहुतेरी जगहों पर तो अंदर भी गोबर था पर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी जिनके दिमागों में पढ़ाई-लिखाई और अपसंस्कृति का कचरा पहुँच चुका था। गोबर उन्हें तेजी से बाहर निकाल रहा था और उनकी जगह खुद ले रहा था।

गायों को संरक्षण देकर देश को सोने की गाय बनाने वाली इस योजना के साल भर पूरे होने पर देश की राजधानी में एक बड़े समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर राजा की इस योजना में प्राण-प्रण से लगे धन्ना सेठ ने बताया कि यह योजना अभूतपूर्व रूप से सफल हो रही है। गायों के मांस और हड्डियों से हमें बड़ी मात्रा में सोना हासिल हो रहा है। इस सोने का बड़ा हिस्सा गौ-संवर्धन में खर्च किया जा रहा है। एक मूर्ख पत्रकार के यह पूछने पर कि गायों के संवर्धन के लिए गायों को भला मारना क्यों पड़ रहा है राजा ने कहा कि यह नीतिगत मसला है जो देश की सुरक्षा से जुड़ा है इसलिए इसका जवाब अभी नहीं दिया जा सकता। हाँ धन्ना सेठ ने जरूर इस बात का स्पष्टीकरण दिया कि हम तो मरी हुई गायों का मांस बेचते हैं जिन्हें मशीनें मारती हैं और मशीनों पर इनसानी कायदे भला कैसे लागू किए जा सकते हैं।

उसी रात आयोजित रात्रिभोज में राजा ने धन्ना सेठ से हुई एक ऑफलाइन बातचीत में हँसते हुए बताया कि वह बनाना तो सोने का हाथी ही चाहते थे पर उसमें कई दिक्कतें थीं। पहली यह कि हाथी संख्या में बहुत कम हैं। दूसरे उन पर नियंत्रण रखना मुश्किल काम है। तीसरी यह कि वह एक विपक्षी दल का चुनाव निशान बनकर पहले ही पतित हो चुका है। और सबसे आखिरी और जरूरी यह कि उसकी खाल ओढ़ना गौ सैनिकों के लिए बहुत ही मुश्किल काम होता। तो वह बनाना तो सोने का हाथी चाहते थे पर मुश्किल यह थी कि घुटनों के बल पर जाने के बाद गौ सैनिक हाथी तो क्या हाथी के बच्चे भी नहीं दिखते। सदा गंभीर रहने वाला धन्ना सेठ इस बात पर बहुत देर तक हँसता रहा। उसका साथ देने के लिए राजा भी देर तक हँसा। हँसते हुए राजा को अचानक से खाँसी आ गई। फिर धन्ना सेठ देर तक राजा की पीठ सहलाता रहा।

उधर गाय थी जो बेबस यह सब देख रही थी। माथे पर जड़े हुए पहचान पत्र से उसका सिर दुखता रहता। कुछ गायों ने दीवाल में या किसी पेड़ आदि पर माथा रगड़ते हुए पहचान पत्र से मुक्ति पानी चाही तो उनका यह कदम राष्ट्रद्रोह माना गया। उन्हें सजा में फाँसी दी गई ताकि दूसरी गायों के लिए यह सबक हो। जब राष्ट्र की प्रतीक गाय ही राष्ट्र की अवज्ञा करेगी तब यह राष्ट्र भला कैसे चलेगा। गायों को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। वे तो यह भी नहीं समझ पा रही थीं कि उन्हें प्रेम और अपनेपन से सहलाने और उनकी देखभाल करने वाले हाथ अब डरे डरे से क्यों लगते हैं। उनमें वह सिहरन भला कहाँ से आ गई? वह कुछ भी न समझ पातीं। उनकी बड़ी बड़ी निर्दोष आँखें हमेशा पनियाई रहतीं। उनके कान हमेशा हिलते रहते। वह बस घास खाती और दूध देती किसी तरह से अपना जीवन बिता रही थीं।

आखिरकार वह गाय ही तो थीं! उन्हें पता ही नहीं था कि इस देश में उनकी हैसियत इतनी बदल चुकी थी। वे एक ताकतवर राष्ट्रीय प्रतीक में बदल चुकी थीं। उनका नाम लेकर किसी का भी सिर धड़ से अलग किया जा सकता था। वैसे अगर उन्हें यह बात पता चल भी जाती तो भला वे कर क्या लेतीं! और रही उस देश के लोगों की बात तो इसके पहले गाय शब्द सुनकर उनके मन में एक ऐसे सीधे सादे जानवर की छवि बनती थी जिसके प्रति उनके मन में कहीं गहरा कृतज्ञता बोध था। पर देश को सोने की गाय बनाने वाली इस महान परियोजना के बाद गाय शब्द सुनते ही उन्हें कँपकँपी होती और उनके सामने एक ऐसे जानवर की छवि आती जिसने सदियों का अपना भोजन चारा खाना छोड़ दिया था। अब वह इनसानों का मांस खाती थी और खून पीती थी। विडंबना यह थी कि इस सब में उस बेचारी गाय की कोई गलती नहीं थी।

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(लेखक हिंदी के चर्चित कहानीकार हैं)

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