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हमें ईद की सेंवई और तुम्हें दीवाली की मिठाई का इंतजार रहता है’

सांप्रदायिक हिंसा और नफरत फैलाने की चाहे लाख कोशिशें होती रही हों लेकिन इन कोशिशों के गहराते काले धुंए में भी दिल को सुकून देने वाली हिंदू-मुस्लिम मोहब्बत की कई मिसालें कायम हैं। कुछ अरसा पहले मिर्जापुर दौरे के दौरान ऐसी ही एक मिसाल देखने को मिली। शालिनी कुशवाहा समेत बहुत सारी हिंदू महिलाओं को यास्मीन फातिमा की ईद की सेंवइयों का शिद्दत से इंतजार होता है तो यास्मीन, हिंदू सहेलियों के घर में बनी होली की गुझियों और दीवाली की मिठाइयों की बाट जोहती है।

जिस सेंटर में ये लोग काम करती हैं वहां यास्मीन अकेली मुस्लिम महिला है और घर पर यास्मीन के मोहल्ले में शालिनी का परिवार अकेला हिंदू परिवार है।

मिर्जापुर में महिलाओं को होम डेकोर की चीजों की ट्रेनिंग देकर रोजगार देने वाली रंगसूत्रा में काम करने वाली लगभग 500 महिलाओं में यास्मीन फातिमा एकमात्र मुस्लिम महिला है। लेकिन रंगसूत्रा सेंटर में ही काम करने वाली शालिनी कुशवाहा इमामबाड़ा के पास यास्मीन की पड़ोसन है और वहां तमाम घर मुसलमानों के हैं। सिर्फ दो घर हिंदुओं के हैं। यानी रंगसूत्रा सेंटर में यास्मीन अकेली मुस्लिम महिला है तो यास्मीन के मोहल्ले में शालिनी और उसकी एक रिश्तेदार, मात्र दो हिंदू परिवार हैं। शालिनी बताती है कि हमें यास्मीन की सेंवई का इंतजार रहता है और यास्मीन को हमारी दीवाली की मिठाई का।

 

शालिनी के पति की आटा चक्की है। वह बतातीं है कि उन्हें तो इस संवाददाता से बात के दौरान दिमाग में आया कि यह मुसलमान हैं और वे हिंदू लेकिन न तो सेंटर में और न ही उनके मोहल्ले में अभी तक किसी के दिलो-दिमाग में यह बात आई है। तीस वर्षीय शालिनी बताती हैं कि लगभग 50-55 मुस्लिम घरों के आसपास अकेला उनका हिंदुओं का घर है। तमाम लोग उनकी दुकान से आटा ले जाते हैं। वह अपनी सास के साथ मुसलमान घरों के शादी-ब्याह तमाम कार्यक्रमों में जाती हैं। सुख-दुख में हिंदू-मुसलमान दोनों एक-दूसरे के साथ साथ खड़े होते हैं।

 

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