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किसी सरकारी योजना का मोहताज नहीं असम का रंगसापारा

(संतोष कुमार सिंह )

देश में स्वच्छता अभियान का बिगुल बेशक मौजूदा सरकार ने फूंका हो लेकिन कुछ लोग बदलाव की बयार के लिए सरकारी योजनाओं के मोहताज नहीं होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान प्रचार से बरसों पहले असम के रंगसापारा गांव के निवासियों ने कुछ संकल्प लिया था..और वह संकल्प जब जमीन पर उतरा तो स्वच्छता के धरातल पर सफलता की नई इबारत लिख दी गई है।

गोलपारा:मुख्य सड़क से नीचे उतरते ही..गांव-गंवई के उबड़-खाबड़ सड़कों पर चलते हुए आप यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि एक ऐसे गांव की ओर बढ़ रहे हैं जो असम का सबसे स्वच्छ गांव है। हम रंगसापारा के रास्ते पर हैं। विचार चल रहा है कि गांव की ओर जाने वाली सड़क इतनी खराब है तो स्वच्छता के दावे कहीं ढ़कोसला तो नहीं। लेकिन जैसे-जैसे गांव नजदीक आता है। आशंकाएं निर्मूल साबित होती है। जी हां, गोलपारा जिला मुख्यालय से लगभग 16 ​किलोमीटर की दूरी पर स्थित बालीजाना ग्रामपंचायत का रंगसापारा गांव। गारो जनजाती के 88 परिवार का वास स्थान है यहां। मात्र 478 जनसंख्या है गांव की। लेकिन इस गांव ने वह कर दिखाया है जिस पर न सिर्फ असम को गर्व है,बल्कि पूरा देश गर्व कर सकता है।
क्या है संकल्प
गांव के हेड मैन यानी प्रमुख राबर्ट जॉन मॉमिन कहते हैं कि वर्ष 1999 में गांव वाले साफ सफाई के विषय में बात किया करते थे। उसी दौरान वर्ष 2000 में स्थानीय लोगों के बैठक में यह तय किया गया कि गांव में स्वच्छता के लिए एक कमीटि बने। 10 लोगों की कमिटी ने गांव की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए चार संकल्प लिया। वो संकल्प हैं:
—गांव में शांति बनाए रखेंगे
—गांव में साफ सफाई रखेंगे..घर से बाहर कूड़ा नहीं फेकेंगे
—गांव भले ही गरीब है लेकिन हर घर में शौचालय का इस्तेमाल किया जाएगा।
— गांव किसी प्रकार के नशे से दूर रहेगा
और इन बातों का उल्लंघन करने वालों पर गांव की स्वच्छता कमिटी 5001 रूपए का जुर्माना करेगी। इस संकल्प को 17 साल हो गए। चुनौतियां जरूर आई होंगी लेकिन गांव अपने संकल्प पर दृढ़ है। आसपास के गांवो में हिंसा की घटनाएं घटीं लेकिन गांव इससे अप्रभावित रहा। आज तक कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि गांव के किसी निवासी को जुर्माने की रकम चुकानी पड़ी हो। लेकिन आज वो दिन आ गया है जब इस छोटे से गांव को असम का सबसे स्वच्छ गांव का पुरस्कार मिला है। पुरस्कार स्वरूप गांव के हेड मैन मोमिन को 5 लाख रूपये की का चेक और प्रमाण पत्र मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने दिया है।

ग्राम पंचायत की प्रमुख रत्ना नाथ कहती हैं कि वैसे तो पूरा पंचायत ही खुले में शौच मुक्त है। पूरे पंचायत मे 2040 घर हैं। हर घर में शौचालय। जिसमें 1804 शौचालय शौचालय स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनाए गये और बाकी के शौचालय ग्रामीणों ने अपनी बदौलत बनाया। रत्ना कहती हैं कि वर्ष 2014-15 में स्वच्छ भारत मिशन आया तो इस दिशा में हमने काफी जोर-शोर से प्रयास शुरू किया। रंगसापारा अपनी उपलब्धी पर गर्व कर रहा है। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि गांव खुले में शौच मुक्त हो गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि रंगसापारा ने यह सफलता सामुदायिक प्रयासों से हासिल किया है। गांव के हर व्यक्ति की भागीदारी। वे कहती हैं कि हमारा गांव यहीं नहीं रूकेगा। पिछले दिनों असम के मुख्य सचिव गांव आये थे। पूरे गांव ने यह संकल्प लिया है कि अब गांव में कोई भी व्यक्ति पॉलिथिन का इस्तेमाल नहीं करेगा। बाकी के संकल्पों की तरह गांव का हर व्यक्ति इस संकल्प को लेकर भी दृढ़ है।

 

ए संगमा आर्मी में नौकरी करते हैं। जबलपुर में कार्यरत हैं। इन दिनों छुट्टी पर गांव आये हुए हैं। कहते हैं न्यूज में जब अपने गांव के विषय में सुना कि गांव को स्वच्छता के लिए पुरस्कार मिल रहा है तो अपनी उपलब्ध्यिों पर गर्व हुआ। हमारा छोटा सा गांव पूरे असम में लोकप्रिय हो जाएगा। 60 वर्षीय फेलोरियस संगमा कहती हैं कच्चा हो या पक्का हम शौचालय का इस्तेमाल शुरू से ही करते आये हैं। पुराने शौचालय में शौच के बाद गंध होता था। लेकिन अब जो नये शौचालय बने हैं वो काफी साफ सुथरे हैं। इसी दौरान गांव की नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली कुछ लड़कियों से होती हैं। गारो जनजाती की ये सभी लड़कियां नौवी कक्षा में पढ़ती हैं। हाई स्कूल की दूरी लगभग 12 किलोमीटर। साईकिल की घंटी टुनटुनाते हुए बेधड़क..बे​​झिझक शिक्षा के प्राप्ति के मार्ग पर निरंतर बढ़ रही है। खुश हैं,उनके गांव में न सिर्फ हर घर में शौचालय है,बल्कि बच्चे, बड़े,बूढ़े सभी उसका इस्तेमाल भी करते हैं। सहेलियों के साथ खड़ी नामची मोमिन कहती हैं कि यहां से हाई स्कूल 12 किलोमीटर दूर है। वे साईकल से स्कूल जाती हैं। बड़ी होकर शिक्षक बनना चाहती हैं। कहती हैं भले ही गांव गरीब है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपनों को पूरा करने में ओर जिस तरह से इस गांव ने योगदान किया है वैसा हर गांव करे तो देश बदल जाएगा। लेकिन उनके साथ ही पढ़ाई कर रहीं जानसी मारक ने कहा कि जिस तरह से गांव में साफ सफाई रहती है, सरकार यदि सड़क बनवा दे तो हम आसानी से साईकल का पैडल मारते हुए स्कूल पहुंचे।
कृषि कार्य और कृषि से जुड़े मजदूरी के जरिए अपना भरण पोषण कर रहे गारो बहुल इस गांव में साफ सफाई के प्रति लोगों को सजग रखने और आपसी भाईचारा बनाए रखने में सरकार के साथ ही चर्च की अहम भूमिका रही है। स्थानीय चर्च में होने वाले साप्ताहिक प्रार्थना में चर्च द्वारा ग्रामीणों को साफ सफाई के महत्व के प्रति जागरूक किया जाता रहा है। रंगसापारा की उपलब्धियों पर चर्चा करते हुए गोलपारा के डिप्टी कमिश्नर जेवीएन सुब्रमण्यम कहते हैं कि रंगसापारा का चयन स्वच्छता पुरस्कार के लिए राज्य सरकार द्वारा किये जाने पर वह बहुत खुश हैं। इस गांव का चयन सिर्फ शौचालय निर्माण या खुले में शौच मुक्त होने के कारण नहीं हुआ है। बल्कि ओमियो कुमार दास इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल चेंज ने इस गांव का चयन किया है। यह समुदाय आधारित स्वचछता अभियान का बेहतर उदाहरण है, जिसमें सरकार की भूमिका प्रेरक की है। ग्रामीण और सरकार मिल जुलकर काम को आगे बढ़ा सकते हैं रंगसापारा इसका बेहतर उदाहरण है। यह पूछे जाने पर कि गांव में सड़क नहीं है सु्ब्रमण्यम ने कहा कि मनरेगा के तहत सड़क निर्माण किया जाना है। जल्द ही गांव तक जाने वाली संपर्क सड़क बेहतर होगी। वे कहते हैं कि इस प्रखंड का एक गांव वर्ष 2006 में ही खुले में शौच मुक्त हो गया था। हमारा लक्ष्य पूरे प्रखंड को खुले में शौच मुक्त करना है। गोलपारा में स्वच्छ भारत मिशन के तहत प्रत्येक दिन 300 शौचालय बनाये जा रहे हैं। सरकार द्वारा इस दिशा में लोगों को जागरूक किया गया है। केवल शौचालय बनाना हमारा लक्ष्य नहीं बल्कि लोग शौचालय का इस्तेमाल करें यह प्राथमिकता है। लोगों के सहयोग से इस दिशा में हमें सफलता भी मिल रही है और ग्वालपारा में डायरिया के मामलों में 50 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई है। सरकार ने असम को ओडीएफ करने का जो लक्ष्य रखा है और जो तिथी निर्धारित की गई है उस समय सीमा के अंतर्गत हम अपने लक्ष्य को पूरा करेंगे।

(लेखक पंचायत खबर के संपादक हैं)

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