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कश्मीरः छर्रों से घायल आंखों पर काला चश्मा पहने फिर आबाद हो रहे स्कूल

कश्मीर घाटी के तमाम स्कूलों में जिंदगी रफ्ता-रफ्ता वापस लौट रही है। सैकड़ों बच्चों की हंसी-ठिठोली की आवाजें गूंजने लगी हैं। विरोध प्रदर्शन और अशांति के आठ महीने बाद लौटी चहलकदमी ने सूनसान स्कूलों की इमारतों को आबाद करना शुरू कर दिया है। हालांकि जिंदगी पहले जैसी नहीं रही। भविष्य के इन चानणमिनारों की आंखों पर जिंदगी भर के लिए काले चश्में चढ़ चुके हैं। बावजूद इसके इनके चेहरे पर फैली खुशी बता रही है कि इन सभी को स्कूल खुलने की बेहद खुशी है।

परंपरागत कश्मीरी लिबास फिरन और स्याह काला चश्मा लगाए चाहे 15 वर्षीय सोफिया हो या 17 वर्षीय मुश्ताक सभी अपने सहपाठियों के गले मिल रहे हैं। कश्मीर में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए छर्रों से नेत्रहीन हुए बच्चे अपनी-अपनी क्लास में हैं। इनमें से इंशा बताती है कि वह पढ़ना चाहती है लेकिन अब वह नहीं देख सकती लेकिन वह इसे जारी रखेगी। वह कहती है कि पढ़ने के लिए मुझे जो भी करना पड़ा वह करेगी।

कश्मीर में अभी भी बर्फ है, सर्दी है , अंधेरा भी है लेकिन इंशा के चेहरे की मुस्कान बता रही है कि इस सबके बावजूद स्कूल खुलने ने उसके चेहरे की चमक बढ़ा दी है। वह अगले वर्ष होने वाली दसवीं की परीक्षा देने के लिए दृढ़बद्ध है। बेशक अब उसे वो दिखाई नहीं दे रहा है जो वह कॉपी में लिख रही है। वह कहती है कि मैं नहीं देख सकती कि मुझे क्या लिखना है लेकिन कोई दिक्कत नहीं क्योंकि मेरे शिक्षक अच्छे हैं।

जुलाई में हुई एक मुठभेड़ में हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की हत्या के तीन दिन बाद कश्मीर में भारी विरोध प्रदर्शन हुआ। उस प्रदर्शन ने इंशा की जिंदगी को हमेशा के लिए अंधेरे में धकेल दिया। कश्मीरी विरोध प्रदर्शन के रूप में बाहर नाराजगी जता रहे थे तभी इंशा ने घर की खिड़की खोली, एक गोली उसके माथे से आकर टकराई और उसकी आंखों की रोशनी छीन ली। श्रीनगर, दिल्ली और मुंबई में सर्जरी के कई दौर के बाद भी इंशा की दृष्टि वापस नहीं आई है।

वह बताती है कि “डॉक्टरों ने मुझसे कहा अल्लाह पर भरोसा रखो। ” वह घर में अपनी मां अफरोजा बानो के हाथ पकड़कर कर चलती है। लेकिन वह निराशा के लंबे इंतजार के बाद खुशी से कूदने लगी जब पिछले सप्ताह अधिकारियों ने दोबारा से स्कूल खोलने की घोषणा की। उसके खराब स्वास्थ्य और खराब मौसम को देखते हुए, उसके माता-पिता शुरू में स्कूल जाने से मना किया। लेकिन वह नहीं मानी। इंशा अगले ही दिन स्कूल आई।

उसके पिता मुश्ताक अहमद लोन खुश हैं कि बेटी खुशी महसूस कर रही है, लेकिन संदेह है कि वह नियमित रूप से स्कूल जा सकेगी या नहीं। वह कहते हैं कि “मुझे लगता है कि उसे सप्ताह में एक या दो दफा स्कूल जाना चाहिए। ”

(फोटो साभारः हिदुस्तान टाइम्स)